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एम्स प्रवेश परीक्षा में शाहजहांपुर और बरेली के जफर व सार्थक आगे

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बरेली।
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एमबीबीएस में प्रवेश के लिए एम्स परीक्षा का रिजल्ट बृहस्पतिवार को घोषित हो गया। बरेली से सार्थक अग्रवाल ने 246 रैंक पाकर शहर का नाम रोशन किया है। जबकि बरेली में रहकर कोचिंग कर रहे शाहजहांपुर पाल गांव के जफर हुसैन ने 1730 रैंक पाए हैं। दोनों छात्रों के फैमिली बैकग्राउंड में कोई भी डॉक्टर नहीं है। अपने परिवार में पहले डॉक्टर बनने वाले दोनों छात्राें का कहना है कि सरकारी सेवा में डॉक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार को इसे अनिवार्य कर देना चाहिए। क्योंकि इतना पैसा खर्च करने के बाद अगर डॉक्टर सीधे प्राइवेट प्रैक्टिस की तरफ भागे तो यह ठीक नहीं। कम से कम कुछ समय तो सरकारी सेवा में देना ही चाहिए। वैसे इस कमी का कारण छात्र चिकित्सकीय सुविधाओं में कमी बता रहे हैं।
फोटो - सार्थक अग्रवाल
  गांव में ज्यादा सीखने को मिलता है
परीक्षा में 246 रैंक पाने वाले सार्थक अग्रवाल ने कोटा में रहकर तैयारी की। पद्मावती एकेडमी से पढ़कर 92.4 फीसदी अंक बारहवीं में और बीबीएल से दसवीं 10 सीजीपीए प्राप्त कर वह 2015 से तैयारी कर रहे थे। धर्मदत्त सिटी अस्पताल के पास प्रेमनगर में रहने वाले सार्थक के पिता सर्वेश कुमार अग्रवाल एलआईसी में कार्यरत हैं और मां शिल्पी अग्रवाल बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापक हैं। अपने मामा की पैरालिसिस बीमारी को ठीक करने की चाहत रखने वाले छात्र का कहना है कि वह एमबीबीएस के बाद न्यूरो में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार में डॉ. पंकज अग्रवाल हृदय रोग विशेषज्ञ हैं जिनसे उनको डॉक्टर बनने की प्रेरणा मिली। डॉक्टरों की कमी पर सार्थक का कहना है कि इंस्टीट्यूट बढ़ाए जाएं और साथ में क्वालिटी भी बढ़े। सरकारी सेवा में अगर कोई डॉक्टर नहीं जाना चाहता है तो उसका बड़ा कारण उनको अच्छा वेतन न मिलना है जबकि काम ज्यादा है। अगर पढ़ाई के बाद गांव में तैनाती मिले तो इसे सार्थक अच्छा मानते हैं। कहते हैं कि गांव में ज्यादा सीखने को मिलेगा। लेकिन डॉक्टरों के लिए सुविधाएं दी जानी चाहिए ताकि मरीज ठीक हो। वहां न तो दवाएं होती हैं और न ही आवश्यक जांचे। ऐसे में कैसे वहां कोई विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हो सकता है।
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सरकार डॉक्टरों को सरकारी सेवा में दे अनिवार्य तैनाती
एम्स प्रवेश परीक्षा शाहजहांपुर के मोहम्मद जफर हुसैन ने 1730 रैंक अर्जित किए हैं। बरेली में रहकर पढ़ने वाले जफर हुसैन के पिता मैसर हुसैन ईट भट्ठा कारोबारी हैं और मां संजीदा बेगम गृहणी हैं। शाहजहांपुर के पाल गांव में रहने वाले जफर ने सोबती पब्लिक स्कूल से 86.75 फीसदी अंक बारहवीं में प्राप्त किए, दसवीं में भी इनके 10 सीजीपीए अपने नाम किए थे। अपने परिवार के पहले डॉक्टर बनने वाले जफर कहते हैं कि उनके न तो ननिहाल में और न ही ददिहाल में कोई डॉक्टर है। बस डॉक्टर बनकर काम करना था इसलिए तैयारी में जुट गया। बरेली के डेलापीर स्थित एक छात्रावास में रहकर जफर ने तैयारी की। सरकारी सेवा में डॉक्टराें की कमी पर जफर बताते हैं कि यहां वेतन को लेकर अभी भी कोई संतुष्ट नहीं है। इसके लिए अगर सरकार को सरकारी सेवा में डॉक्टराें की कमी को पूरा करना है तो पढ़ाई के बाद यहां चिकित्सा सेवा करना अनिवार्य करना चाहिए। इतना पैसा खर्च करने के बाद अगर कोई डॉक्टर निजी क्लीनिक खोले तो यह अच्छी बात नहीं है। कम से कम कुछ साल अच्छी प्रैक्टिस और देश सेवा के लिए इनको गांव में भी तैनात करना चाहिए। वैसे जफर का कहना है कि कुछ लोगाें का एंबिशन मदद करना होता है लेकिन कुछ पैसे के लिए डॉक्टरी सेवा में आते हैं।
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