बरेली। हाल ही में बीडीए के सर्वे में चिन्हित की गई साढ़े तीन सौ से ज्यादा अवैध इमारतों की कंपाउंडिंग की प्रक्रिया शुरू होने के साथ यह सवाल भी उठने लगे हैं कि इस बार कंपाउंडिंग नियमों के मुताबिक होगी या फिर वैसे ही जैसे हमेशा होती रही है। दरअसल बीडीए के कंपाउंडिंग के खेल में पूरे शहर का सत्यानाश हो चुका है। अवैध निर्माण होते वक्त आंख मूंद लेना और फिर नियमों को तोड़मरोड़कर उनकी कंपाउंडिंग कराकर उन पर वैध होने की मुहर लगा देना बीडीए के स्टाफ की पुरानी फितरत है। इस खेल में बीडीए के स्टाफ पर तो जमकर नोट बरसते हैं लेकिन शहर में समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
शहर में बने नर्सिंग होम, बरातघर, शॉपिंग मॉल, मल्टीस्टोरी कामर्शियल बिल्डिंग, कांपलेक्स जैसी तमाम इमारतों में ज्यादातर में बीडीए के नियमों का पालन नहीं हुआ है। इनमें से एक प्रमुख अवैध निर्माण सिविल लाइंस में एक हाई प्रोफाइल बिल्डर की मल्टीस्टोरी कामर्शियल बिल्डिंग का था जिस पर कई साल पहले सवाल उठे थे। इस बिल्डिंग को नक्शे के विपरीत बनाया गया, जब कंपाउंडिंग कराने की नौबत आई तब भी बड़े-बड़े अफसरों ने हाथ खड़े कर लिए। पीलीभीत बाईपास और आईवीआरआई रोड पर एक बहुमंजिला इमारत स्वीकृत नक्शे के उलट बन गई। उसकी कंपाउंडिंग के नाम पर बीडीए में जमकर सौदे हुए। नैनीताल रोड पर एक बड़े शिक्षण संस्थान ने बहुमंजिल इमारत बनाने के लिए न बीडीए से नक्शा स्वीकृृत कराया न कृषि योग्य जमीन का लैंडयूज बदलवाया। कंपाउंडिंग के लिए जब करोड़ों रुपये जमा कराने की नौबत आई तो दिग्गज भाजपा नेताओं की सिफारिश पर यह मामला शासन में चला गया जो बरसों बाद भी लंबित पड़ा हुआ है। बीडीए इस पर कोई पैरवी भी नहीं कर रहा है।
इसी तरह बीसलपुर रोड पर दर्जनों अवैध शिक्षण संस्थान खुल गए। इनमें तमाम संस्थानों ने लैंडयूज बदले और नक्शे मंजूर कराए बिना ही बिल्डिंग बना ली। डीडीपुरम से डेलापीर तक आवासीय एरिया में बड़ी संख्या में कामर्शियल बिल्डिंग भी बीडीए की पुरानी कार्यशैली का नमूना हैं। कुदेशिया फाटक से कर्मचारी नगर चौराहा और मिनी बाईपास तक दर्जनों कामर्शियल बिल्डिंग अवैध तरीके से बनकर खड़ी हैं। इनमें से बहुत सी बिल्डिंगों की कंपाउंडिंग हो तक नहीं सकती, मगर वह भी बीडीए इंजीनियरों की देखरेख में कंपाउंडिंग प्रक्रिया तक पहुंच गई।
ये हैं कंपाउंडिंग के प्रमुख नियम
1- अगर कोई भवन मालिक आवासीय एरिया में आवासीय नक्शा मंजूर कराकर उसमें कामर्शियल गतिविधियां जैसे नर्सिंग होम, बरातघर, दुकान, ऑफिस आदि चला रहा है तो व्यवसायिक गतिविधियों में चलने वाले हिस्से (अधिकतम 30 फीसदी) को कामर्शियल में निर्धारित समन शुल्क जमाकर कंपाउंड किया जा सकता है। बेशर्ते इस भवन के आगे की रोड की चौड़ाई 24 फुट हो।
2- अगर किसी ने अपने भवन का नक्शा कामर्शियल मंजूर कराया है लेकिन निर्माण स्वीकृत नक्शे के विपरीत अधिक करा लिया है। बिल्डिंग के आगे पीछे सेट बैक फ्रंट बैक नहीं छोड़ा है तो उस भवन की निर्धारित शमन शुल्क जमा कर कंपाउंडिंग होगी। कंपाउंडिंग में अधिक बनी बिल्डिंग को तोड़कर सेट बैक और फ्रंट बैक छोड़ना अनिवार्य होगा।
3- इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज या अन्य बड़े व्यवसायिक भवनों के नक्शे स्वीकृत करने से पहले बीडीए बोर्ड उस पर विचार करेगा। इन शिक्षण संस्थानों को अपनी जमीन का लैंडयूज बदलवाना पड़ेगा। अगर बिना लैंडयूज बदले बिल्डिंग बनी है तो उसको भी निर्धारित शमन शुल्क लेकर कंपाउंड कराने का प्रावधान है। मगर, इनका शमन शुल्क इतना अधिक होता है कि अधिकांश व्यवसायी आधी-अधूरी कंपाउंडिंग कराते हैं।
4- आवासीय कंपाउंडिंग में जमीन की लागत का 6.25 प्रतिशत और व्यवसायिक कंपाउंडिंग में 12 प्रतिशत शुल्क जमा करने का प्रावधान है। शासन से शमन शुल्क जमा करने के संबंध में नियम बदलते भी रहते हैं।
5- अगर किसी भवन मालिक ने फ्रंट और सेट बैक नहीं छोड़ा है तो उस बिल्डिंग का 25 प्रतिशत हिस्सा ही कंपाउंड हो सकता है। इसमें सर्किल रेट की दो गुनी कीमत तक का शमन शुल्क जमा करना पड़ सकता है।
ऐसे होता है कंपाउंडिंग में खेल
क्रेडाई के एक सीनियर पदाधिकारी की मानें तो बीडीए में जब किसी आवासीय या कामर्शियल बिल्डिंग की कंपाउंडिंग की जाती है तो उसमें बीडीए का स्टाफ अतिरिक्त फायदा लेकर अवैध बिल्डिंग में 25 प्रतिशत हिस्से की कंपाउंडिंग करता है। भवन मालिक से 75 फीसदी हिस्सा तोड़ने का शपथ पत्र लिया जाता है, जिसमें लिखा होता है- ‘टू बी डिस्मेंटल’। इस खेल में प्राधिकरण के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, माली, सुपरवाइजर और जेई से लेकर ऊपर तक अफसर शामिल होते हैं। तभी अवैध बिल्डिंग की कंपाउंडिंग संभव होती है, जबकि प्राधिकरण नियमानुसार अवैध भवन के 75 फीसदी हिस्से को तोड़ना जरूरी है। इस हिस्से के टूटने की वीडियो और फोटोग्राफी कराकर बीडीए टीम निरीक्षण करे। उसकी रिपोर्ट मिलने के बाद ही कंपाउंडिंग होनी चाहिए।