रक्षाबंधन पर आसमान में उड़ने वाली पतंगे अब दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी इतराएंगी। पतंगाें को एलईडी लाइटों से सजाया गया है। इसमें इलेक्ट्रिक छोटी बैटरी लगी है। जिससे पतंग उड़ते समय रात में जगमग करेगी। पतंग की कीमत सात रुपये बताई जा रही है। इसकी खूब डिमांड है।
रक्षाबंधन आने में कुछ ही दिन बचे हैं। इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा पुरानी है। रक्षाबंधन पर एलईडी वाली लाइटों के साथ सफाई अभियान का संदेश आसमान से भी दिया जाएगा। सफाईगिरी लिखी पतंगाें से बाजार सज गया है। रंग बिरंगी, खूबसूरत पतंगाें में बाहुबली भी दिखेंगे और मोदी भी। बाजार में भीड़ दिख रही है। पतंग का कारोबार पिछले साल के मुकाबले इस साल बढ़ा है। बाजार में पीएम नरेंद्र मोदी, बाहूबली और बच्चों के लिए तरह- तरह के कार्टून के फोटो छपी पतंगें बाजार में हैं। सराय खाम स्थित पतंगों की दुकान पर पतंग विक्रेता इनाम अली बताते हैं कि बरेली में केवल कागज की ही पतंगे बनती हैं। पन्नी की पतंगे कानपुर, कोलकाता और अहमदाबाद से आती हैं। घर को सजाने के लिए तरह-तरह की पतंगें बाजार में मौजूद हैं। एलईडी लाइट की पतंगाें को शौकीनों के लिए बनाया गया है। इसमें छोटी- छोटी लाइटें लगी हैं। यहीं के पतंग विक्रेता सैफ अली ने बताया कि इस समय रक्षाबंधन की वजह से पतंगों की इतनी मांग है कि शाम के समय दुकान पर पतंग खरीदने वालों का तांता लगा रहता है। शौकीन लोग एक बार में दस दस पतंगे खरीद कर ले जाते हैं।
वहीं गंगापुर में पतंग विक्रेता लाला राम पिछले पचास सालों से कागज की पतंग बनाते और बेचते हैं। इनका कहना है कि कागज की पतंगें अधिकतर बडे़ पतंगबाजों को पसंद आती हैं। इनमें छपाई तो नहीं होती है लेकिन रंग बिरंगे कागज का इस्तेमाल करके तरह तरह की डिजाइनें बनाईं जाती हैं। रक्षाबंधन पर तो कागज की पतंग की ज्यादा मांग नहीं होती है लेकिन ईद के त्योहार पर चांद सितारे बनी कागज की पतंग खूब बिकती है।
बरेली के मांझे की डिमांड अधिक
तसलीम बेग मांझा कारीगर बताते हैं कि चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध लगने के बाद से बरेली के मांझे को बाजार मिला है। इस बार चाइनीज मांझा बाजार में न होने की वजह से सिर्फ बरेली का बना ही मांझा बिक रहा है। माझे की चरखी 40 रुपये से लेकर 170 रुपये तक की है।
एक रुपये का सिक्का बंद होने की अफवाह से हो रहा नुकसान
पतंग विक्रेता इनाम अली ने बताया कि एक रुपये का सिक्का बंद होने की अफवाह से त्योहार के सीजन में नुकसान उठाना पड़ रहा है। पतंग का व्यापार पूरी तरह से छोटे सिक्के पर ही निर्भर है जिससे विक्रेताओं को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों के इस अफवाह से ज्यादा नुकसान हो रहा है।