बरेली। बाबू जी के दिए मंत्र नए दौर की सियासत में नहीं चले। यही वजह रही कि बाबू जी के न रहने के बाद उनके बड़े बेटे ने एक सिर्फ एक बार सियासत में भाग्य आजमाया और इतने से ही समझ लिया कि नए दौर की सियासत में बाबू जी के उसूलों पर चलने का रास्ता बंद हो चुका है। इसके बाद न उन्होंने कभी सियासत की ओर मुड़कर देखा, न उनके दो छोटे भाइयों ने।
बाबू जी यानी हरीश गंगवार, जिनकी विनम्रता, सादगी और ईमानदारी की मिसाल आज भी दी जाती हैं। बाबू जी केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के चाचा थे। देश को आजादी मिलने के बाद उन्होंने विपक्ष की राजनीति का रास्ता चुना था। जनसंघ के टिकट पर वह 1962, 1967 और 1974 में भोजीपुरा से विधायक चुने गए। 1967 में जनसंघ ने बाबू जी को विधानमंडल दल का मुख्य सचेतक भी बनाया। 1977 की जनता लहर में जब उनका टिकट काट दिया गया तो अपने समर्थकों के दबाव में उन्होंने जनसंघ से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए। 1980 में ही कांग्रेस ने उन्हें पीलीभीत के लोकसभा चुनाव में उतार दिया। अपनी जुझारू और ईमानदार छवि के दम पर पीलीभीत के पहले ही चुनाव में उन्होंने जीत का परचम लहरा दिया और सांसद बन गए। इसी दौर में लोकसभा में डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी के उपनेता भी रहे। फिर जनता दल के टिकट पर 1989 में बीसलपुर का विधायक बनने के बाद उन्हें प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया गया था। 1991 के चुनाव में बीसलपुर से पराजित होने के बाद बाबू जी अपने पुराने क्षेत्र भोजीपुरा लौट आए। 1993 में यहां से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और एक बार फिर विधायक बने। यह वो दौर था जब सियासत का रंग तेजी से बदल रहा था। 1996 में दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा तो उन्होंने महसूस कर लिया कि राजनीति में अब उन जैसे लोगों की जगह कम होती जा रही है और फिर सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। 2011 में बाबू जी इस दुनिया से चले गए मगर उनकी शख्सियत की मिसाल लोग अब भी देते हैं।
राजनीति अब चालपट्टी का काम इसलिए छोड़ दी
बाबू जी के तीन बेटे हैं। सबसे बड़े देवेश गंगवार, दूसरे नीरज गंगवार और तीसरे पंकज गंगवार। पंकज तो रेलवे पुलिस फोर्स में डीआईजी हैं, देवेश और नीरज अपना कारोबार कर रहे हैं। सबसे बड़े बेटे देवेश ने बाबू जी के सामने ही 1991 में नवाबगंज सीट के लिए विधानसभा चुनाव में नामांकन कराया था, लेकिन चुनाव से पहले ही एक निर्दलीय प्रत्याशी की मौत की वजह से चुनाव स्थगित हो गया। दोबारा चुनाव के लिए फिर नामांकन हुए तो देवेश पीछे हट गए। इस चुनाव में भगवत सरन गंगवार विधायक बने थे। इसके बाद देवेश ने एक बार और शहर में मेयर पद का चुनाव लड़ा, जिसमें वह सुभाष पटेल से पराजित हो गए। देवेश कहते है कि इसी चुनाव में उन्हें सबक मिला कि राजनीति अब कितनी बदल चुकी है। चालपट्टी, झूठ, छल और फरेब के बगैर यहां कामयाब होना मुश्किल है। चुनाव जीतने के लिए नेता जनता के सामने कुछ और कहते हैं और उनकी असलियत कुछ और होती है। बेईमानी और भ्रष्टाचार से ही राजनीति में आपको समर्थन मिलता है। स्वार्थ पूरे नहीं होते तो आपके अपने ही आपकी पीठ में छुरा भोंक देते हैं। यह पता ही नहीं लगता कि कौन अपना है और कौन पराया। इसी वजह से राजनीति छोड़ने का फैसला कर लिया और फिर कभी इस फैसले पर पुनर्विचार तक नहीं किया।
जनता को काम बताने का हकदार मानते थे बाबू जी
देवेश गंगवार बताते हैं कि बाबू जी जब तक राजनीति में रहे, जनता को हमेशा अपना काम बताने का हकदार मानते रहे। उन्होंने कभी यह भी नहीं देखा कि उनके पास काम लेकर आया व्यक्ति कहां का है और उनका विरोधी है या समर्थक। जब वह बीसलपुर से विधायक थे तब भी भोजीपुरा या अन्य क्षेत्रों के लोग उनके पास काम लेकर पहुंच जाया करते थे। वह कभी उनके काम को इंकार नहीं करते थे। हर एक से बड़ी आत्मीयता से मिलना उनका स्वभाव था। उसका काम कराने में भी पूरी ताकत लगा देते थे। जनता भी उन्हें अपने परिवार की तरह मानती थी।