बरेली। भ्रष्टाचार के मामलों में गर्दन तक धंसे डीपीआरओ विनय कुमार भी आखिरकार नप ही गए। उनके खिलाफ गबन के तमाम मामलों की शिकायत शासन में पहुंची थी। शासन के आदेश पर कमिश्नर ने जांच कराई तो सामने आया कि डीपीआरओ ने 14वें वित्त की 32 लाख रुपये की रकम ग्राम पंचायतों को देने के बजाय खुद हजम कर ली। भ्रष्टाचार के कई और मामलों में भी उनकी संलिप्तता मिली थी। कमिश्नर ने फरवरी में ही रिपोर्ट शासन में भेज दी थी।
14वें वित्त की रकम हड़पने के अलावा डीपीआरओ विनय कुमार पर यह भी आरोप था स्वच्छ भारत मिशन के तहत ऐसे वाहन लगा लिए गए जिनका रजिस्ट्रेशन टैक्सी परमिट में था ही नहीं। सरकारी वाहन होते हुए भी डीपीआरओ ने इन वाहनों से अनुबंध कर लिया। इसके अलावा पंचायत पदाधिकारी और पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के लिए 2017 और 2018 में दो करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि विकास खंडों को दी गई थी। इसे भी कागजों पर ही ठिकाने लगा दिया गया था। कमिश्नर की जांच में इसमें 1.32 करोड़ की धनराशि के दुरुपयोग की पुष्टि हुई थी। विनय कुमार पर भ्रष्टाचार का एक और बड़ा मामला नियमों की धज्जियां उड़ाकर चहेतों को मलाईदार सीटों पर बैठाने का मामला शासन तक पहुंचा था। वरिष्ठता सूची को दरकिनार कर उन्होंने ऐसे ग्राम पंचायत अधिकारियों को प्रभारी एडीओ बना दिया था जिनकी सेवाएं दो वर्ष से भी कम थीं।