बरेली। सरदारनगर में ग्लैंडर्स पीड़ित एक अन्य घोड़े को सोमवार को मर्सी डेथ दे दी गई। इसके साथ ही डेढ़ माह के भीतर ग्लैंडर्स पीड़ित घोड़ों को मर्सी डेथ दिए जाने का यह तीसरा मामला हो गया है।
ब्लाक आलमपुर जाफराबाद क्षेत्र के ग्राम सरदारनगर निवासी वीरपाल के दो घोड़ों के खून के सैंपल 20 दिन पहले जांच के लिए भेजे गए थे। पांच दिन पहले प्राप्त रिपोर्ट में एक घोड़े को ग्लैंडर्स की पुष्टि ने पशुपालन विभाग की चिंता बढ़ा दी। पशु चिकित्सालय भमोरा के प्रभारी डॉ. गौरव मोहन ने वीरपाल के घर जाकर इसकी जानकारी दी और घोड़े को मर्सी डेथ देने के लिए राजी किया। तय कार्यक्रम के तहत श्यामगंज पशु चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. रामलखन के नेतृत्व में गठित तीन डाक्टरों की टीम सोमवार सुबह सरदारनगर पहुंची। गांव से कुछ दूर स्थित खाली पड़े मैदान में वीरपाल के घोड़े (राजू) को डॉक्टरों ने इंजेक्शन लगाकर मौत की नींद सुला दिया। इसके बाद जेसीबी से गड्ढा कराकर उसी मैदान में चूना डालकर दफना दिया। मर्सी डेथ देने वाली डॉक्टरों की टीम ने अपनी सुरक्षा किट भी घोड़े के साथ ही दफना दी। टीम में डॉ. गौरव मोहन और ब्रूक इंडिया के डॉ. योगेंद्र सिंह भी शामिल रहे। वीरपाल के दोनों बेटे और ग्राम प्रधान संजय संजय चौहान भी मौजूद रहे। पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रामलखन ने बताया कि इससे पहले रिठौरा निवासी किशन बाबू और भोजीपुरा के ग्राम बोहित निवासी अनोखेलाल के ग्लैंडर्स पीड़ित दो घोड़ों को मर्सी डेथ दी जा चुकी है।
कहीं ग्लैंडर्स से तो नहीं मरा वीरपाल का दूसरा घोड़ा
भमोरा पशु अस्पताल के चिकित्सक डॉ. गौरव मोहन ने बताया कि सरदारनगर निवासी वीरपाल के दो घोड़ों के सैंपल भेजे गए थे। जिस घोड़े को सोमवार को मर्सी डेथ दी गई ,उसकी सैंपल रिपोर्ट पांच दिन पहले ही प्राप्त हुई थी। अभी दूसरे घोड़े की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है, मगर उसकी दस दिन पहले ही स्वत: मौत हो गई थी। संभव है कि वह घोड़ा भी ग्लैंडर्स पीड़ित रहा हो। मगर स्थिति उसकी रिपोर्ट आने पर ही साफ होगी।
राजू की मौत के बाद उदास है वीरपाल का परिवार
भमोरा। ग्राम सरदार नगर निवासी भूमिहीन वीरपाल कश्यप के लिए तो उसके सफेद घोड़ों की जोड़ी ही रोजी-रोटी का सहारा थी। दोनों घोड़े बरातों में बग्घी के लिए बुक होते थे। बरात का सीजन न होने पर वीरपाल बरेली से तांगे से सामान ढोता था। डेढ़ माह पहले एक घोडे़ में बीमारी के लक्षण नजर आने पर उनका सैंपल जांच को भेजा था। इनमें एक घोड़े की दस दिन पहले मौत होने से वीरपाल टूट चुका था। जीविका चलाने के लिए वह दूसरे घोड़े की तलाश कर ही रहा था कि सोमवार को दूसरे घोड़े ‘राजू’ को भी मौत की नींद सुला दिया गया। वीरपाल का कहना है कि दोनों घोड़ों की मौत से उसे आर्थिक तंगी से जूझना पड़ेगा। ‘राजू’ को सबसे अधिक प्यार व देखरेख उसका छोटा बेटा नरेश करता था। राजू की मौैत के बाद से नरेश के साथ ही पूरा परिवार उदास है।