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अब खुफिया एजेंसी बताएं.. वह कौन सा ‘अंकगणित’ था

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बरेली। एग्जिट पोल जैसे काम वैसे तो खुफिया एजेंसियों के नहीं हैं लेकिन लोकसभा चुनाव के परिणाम जिस तरह उनकी रिपोर्ट के उलट आए, उससे उनकी काबिलियत और क्षमता पर सवाल जरूर खड़ा हो गया। हालांकि खुफिया एजेंसियां ही नहीं, हवा का रुख भांपने में माहिर सियासत के धुरंधरों का तजुर्बा भी उन्हें दगा दे गया। यह हवा किसी और तरफ बह रही थी, अनुमान किसी और दिशा में लगाए जा रहे थे।
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दरअसल, चुनाव के नतीजे आने तक भाजपा के विरोधी दलों का अंकगणित सबके सिर चढ़कर बोल रहा था। कागजों पर बिरादरियों का जो गणित अंकों के साथ शून्य दर शून्य बढ़ता दिख रहा था, वह सभी के जहन पर ऐसा हावी हो चुका था कि कोई उससे अलग कुछ सोचने के लिए तैयार ही नहीं हुआ। यह अंकगणित बता रहा था कि बरेली मंडल में इस बार पांच में से तीन सीटें भाजपा के हाथ से खिसक रही हैं, खुफिया एजेंसियों की दफ्तरों में बैठकर बनाई गई रिपोर्ट का आधार भी यही अंकगणित था, लेकिन चुनाव में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की केमिस्ट्री अंदर ही अंदर पूरा काम कर चुकी थी। अंकगणित के आंकड़े एक-एक सीट पर बिखर गए। मोदी और शाह की केमिस्ट्री से भाजपा बरेली जैसी पुख्ता सीट ही नहीं बदायूं, आंवला जैसी कमजोर सीट भी जीतने में सफल रही। शाहजहांपुर की आखिर तक असमंजस में रखने वाली सीट पर भी इस केमिस्ट्री ने भाजपा को भारी वोटों से जीत दिलाकर भगवा परचम लहरा दिया।
इस चुनाव ने यह भी साबित किया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने चुनाव प्रबंधन को उनके परंपरागत तौर-तरीकों से बाहर निकालकर ऐसे मुकाम तक पहुंचा दिया है, जहां तक सोचना भी अभी भाजपा विरोधी दलों के लिए मुमकिन नहीं है। अगर ऐसा न होता तो भाजपा ने जब शाहजहांपुर के साथ एक-एक कर तमाम सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों को अपना प्रत्याशी बनाया, तभी विरोधी दल यह समझ गए होते कि भाजपा इन सीटों पर जनता का मन टटोल चुकी है। बरेली में जहां पार्टी ने पुराने चेहरे संतोष गंगवार पर ही दांव लगाया, वहीं शाहजहांपुर में पिछली बार मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहीं कृष्णा राज का टिकट काटकर बसपा से आए अरुण कुमार सागर को टिकट दिया। कृष्णा राज का शाहजहांपुर लोकसभा क्षेत्र में फीड बैक ठीक नहीं था। जनता में कृष्णा राज के प्रति नाराजगी थी। पीलीभीत में मेनका गांधी की स्थित हालांकि ठीक थी, लेकिन सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर वरुण गांधी के कामकाज का फीड बैक पार्टी के सर्वे में ठीक नहीं मिल रहा था। इसलिए पीलीभीत और सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर मैच्युल अदला-बदली की गई। इस केमिस्ट्री का नतीजा यह था कि भाजपा दोनों सीटें जीतने में सफल रही। बदायूं में भाजपा ने मंडल में एक सवर्ण फार्मूले को भी दरकिनार करते हुए 2014 में चुनाव लड़े बागीश पाठक को टिकट न देकर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघ मित्रा मौर्य पर दांव लगाया। उसकी भी केमिस्ट्री यही थी कि बदायूं में मौर्य, शाक्य मतदाताओं की संख्या यादव मतदाताओं के आस-पास ही है। सवर्ण वोट बैंक भाजपा का ही माना जाता है। दलितों में भी पार्टी ने सेंध लगाई। नतीजा मोदी के नाम और बेहतर बूथ प्रबंधन के दम पर भाजपा ने बदायूं में सपा के मजबूत नेता और कई बार सांसद रहे धर्मेंद्र यादव को वापस सैफई लौटने पर मजबूर कर दिया। आंवला में राजनीतिक पंडित भाजपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप से बसपा से कांटे की टक्कर बता रहे थे, लेकिन गठबंधन का अंकगणित यहां भी फेल हो गया। मोदी की प्रचंड लहर और केमिस्ट्री ने जातीय समीकरण ध्वस्त कर यह सीट भी बड़े अंतर से जीत ली। कुल मिलाकर मंडल की पांचों सीटों पर सपा-बसपा का अंकगणित न चलकर मोदी और शाह की केमिस्ट्री ही चली और सफल भी रही।
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