बरेली। लोकसभा की बरेली सीट का इतिहास रहा है कि यहां न तो कभी सपा का सांसद बना और न ही बसपा का। इस बार दोनों पार्टियों का गठबंधन हो गया और रालोद भी उनके साथ आ गई। इस गठबंधन से सपा के पूर्व मंत्री एवं विधायक भगवत सरन गंगवार को प्रत्याशी बनाया गया। भगवत के प्रत्याशी बनने से चुनाव तो दिलचस्प हुआ, लेकिन बरेली सीट का इतिहास नहीं बदला। मोदी लहर के आगे गठबंधन टिक नहीं सका और भगवत को हार का मुंह देखना पड़ा। इसका एक बड़ा कारण सपा में भितरघात भी रहा।
सपा के इतिहास में यह पहला लोकसभा चुनाव था, जिसमें जिला और महानगर संगठन भंग चल रहे थे। चुनाव की देखरेख के लिए संचालन समिति गठित की गई थी। चुनाव से पहले ही सपा में जिला और महानगर अध्यक्ष के पदों को लेकर काफी उठापटक चल रही थी। भगवत सरन को भी जिलाध्यक्षी का दावेदार माना जा रहा था, लेकिन चुनाव में नुकसान से बचने के लिए पार्टी नेतृत्व ने जिला एवं महानगर इकाइयां घोषित नहीं कीं। इसके बजाय चुनाव संचालन समिति बनाकर प्रमुख नेताओं को उसमें शामिल कर दिया। लेकिन इस संचालन समिति के तमाम नेता चुनाव में भी भितरघात से नहीं चूके। मतदान के दौरान दो-तीन बार तो सपा नेता भगवत के चुनाव कार्यालय पर भिड़ भी गए। कहासुनी और माइक फेंकने तक की नौबत आ गई। वहीं कुछ पार्षद भी चुनाव मैदान से गायब नजर आए। वहीं, गठबंधन के बावजूद बसपा के नेता भी कुछ ही मौकों पर नजर आए। परिणामस्वरूप भगवत सरन गंगवार अकेले ही चुनाव मैदान में दमखम दिखाते नजर आए।
मतगणना स्थल पर भी अकेले घूमते रहे भगवत
परसाखेड़ा में मतगणना के दौरान बड़े नेताओं में सुल्तान बेग के अलावा कोई भी नजर आया। भगवत सरन गंगवार अकेले ही पूरे परिसर में घूमते नजर आए। इसके अलावा योगेश यादव, चंद्रशेखर एडवोकेट, सूरज यादव और संजीव आदि मौजूद रहे। पूर्व जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव कुछ देर रुककर ही चले गए।
ऑडियो वाले नेता भी रहे नदारद
पिछले दिनों सपा के एक पूर्व विधायक का ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें वह कार्यकर्ता से भगवत सरन को वोट न पड़ने देने के लिए बात कह रहे थे। मामला खुलने के बाद इसकी शिकायत पार्टी नेतृत्व तक पहुंच गई। यह नेता भी मतगणना से नदारद रहे।
‘बहुत ही अप्रत्याशित नतीजे आए हैं। कहां चूक हुई, इसकी समीक्षा की जाएगी। ऑडियो वायरल होने के संबंध में नेतृत्व को अवगत करा दिया गया है। वहां से जो भी निर्देश मिलेंगे, उनका पालन होगा।’
- शुभलेश यादव, पूर्व जिलाध्यक्ष