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तब मीरगंज और बिथरी बने थे जीत-हार के टर्निंग प्वाइंट

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बरेली। दस साल पहले हुए लोकसभा चुनाव की जब मतगणना चल रही थी, उसमें प्रत्याशियों को काफी उतार-चढाव देखने पड़े। उस चुनाव में लगातार सातवीं बार भाजपा से चुनाव मैदान में उतरे संतोष गंगवार अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे। मगर जब मतगणना शुरू हुई तो उनको अप्रत्याशित हार मिली। संतोष गंगवार उस चुनाव में केवल नवाबगंज से ही जीत पाए थे। बाकी चारो विधानसभाओं शहर, कैंट, मीरगंज और भोजीपुरा से कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन से पिछड़ गए थे। मीरगंज से पिछड़ते ही संतोष गंगवार ने हार मान ली थी और बीच मतगणना में ही उठकर चले आए थे।
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संतोष गंगवार लगातार छह बार चुनाव जीत चुके थे। 2009 में सातवीं जीत दर्ज करने के इरादे से उतरे। उस समय न तो नरेंद्र मोदी फैक्टर था, न ही अन्य किसी तरह की लहर। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की नाराजगी के चलते लोध वोट भी भाजपा से नाराज था। संतोष गंगवार ने लोध वोटरों की नाराजगी दूर करने के लिए मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को बुलाकर उनकी सभा भी कराई, लेकिन वह काम नहीं नहीं आ सकी। लोध बिरादरी के मतदाताओं ने भाजपा से किनारा कर लिया और संतोष गंगवार को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा।
दूसरी ओर उसी चुनाव में पीलीभीत की सांसद मेनका गांधी ने आंवला से लोकसभा चुनाव लड़ा। उनको तबके सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप और बसपा के सर्वराज सिंह कड़ा मुकाबला करना पड़ा। मेनका गांधी अपनी परंपरागत सीट पीलीभीत छोड़कर आंवला चुनाव लड़ने आई थीं। मतगणना जब प्रारंभ हुई तो उस समय के सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप लगातार मेनका गांधी पर बढ़त बनाए रहे। एक बार तो मेनका को लगा कि वह चुनाव में पराजित हो गईं और वह बीच मतगणना में ही उठकर चली गईं। वह शेखूपुर में भारी अंतर से सपा प्रत्याशी से पिछड़ गई थीं, लेकिन जब बिथरी का नंबर आया तो यहां से मेनका को बंपर वोट मिले। उन वोटों ने न केवल शेखूपुर के अंतर को पाटा बल्कि उनको बढ़ दिलाकर जीत भी दिला दी। मतलब 2009 के लोकसभा चुनाव की मतगणना में मीरगंज और बिथरी बरेली और आंवला लोकसभा सीटों पर जीत के टर्निंग प्वाइंट बने थे।
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