बरेली। हाल ही में एक ऑडियो वायरल हुआ जिसमें समाजवादी पार्टी के एक कद्दावर नेता अपनी बिरादरी के लोगों को फरमान जारी करते सुनाई दे रहे थे कि अपना वोट सपा प्रत्याशी को देकर खराब न करें। मामला हाईकमान तक चला गया है, हालांकि नेताजी फिलहाल कार्रवाई से बचे हुए हैं। माना यह जा रहा है कि अभी भितरघात को मुद्दा नहीं बनाया जाना है। भितरघात का यह अकेला मामला नहीं है। बरेली मंडल की पांचों सीटों पर कोई न कोई प्रत्याशी जबर्दस्त भितरघात का शिकार हुआ है। दलों में तय हुआ है कि इन मामलों की समीक्षा के साथ कार्रवाई भी तभी होगी जब हाईकमान ग्रीन सिग्नल देगा। फिलहाल तो पूरा फोकस ईवीएम पर रखना है।
पार्टी के ही लोगों के सर्वाधिक असहयोग जो भितरघात की हद तक चला गया, उसका शिकार आंवला सीट पर एक उम्मीदवार को होना पड़ा। इस धनाढ्य उम्मीदवार से तो पहले स्वार्थ सिद्धि की कोशिशें हुईं, कुछ लोग कामयाब हुए और जिन लोगों को इसमें सफलता नहीं मिली वह उनके चुनाव से दूर हो गए। पार्टी के लोगों के असहयोग की वजह से इस उम्मीदवार को चुनाव प्रचार और दूसरे इंतजाम संभालने के लिए निजी तौर पर लोगों का इंतजाम करना पड़ा। हाल ही में इसकी पुष्टि तब फिर हुई जब इस उम्मीदवार ने बरेली और आंवला में पार्टी के लोगों को अनदेखा करते हुए मतगणना में अपने एजेंट बनाने के लिए भी निजी कार्यकर्ताओं की सूची प्रशासन को थमा दी। हालांकि प्रशासन की आपत्ति के बाद उन्हें इनमें से आधे एजेंट बनाने के लिए स्थानीय लोगों के भी नाम देने पड़े। दो पार्टियों का मामला होने के बावजूद यह मामला सिर्फ अंदरूनी तौर पर चर्चाओं में है। हाईकमान ने अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है।
पीलीभीत में भी एक उम्मीदवार को भितरघात का शिकार होना पड़ा। चुनाव की शुरुआत में उनकी स्थिति मजबूत मानी जा रही थी लेकिन जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आता गया वह कांटे के मुकाबले में फंसते गए। बदायूं में भी एक उम्मीदवार के साथ यही हुआ। शाहजहांपुर में दो प्रमुख उम्मीदवार भितरघात के शिकार हुए। उनके खेमों के कई प्रमुख लोगों ने अंदर ही अंदर सेंध लगाकर उनकी हालत पतली कर दी। पिछले चुनाव के मुकाबले काफी ज्यादा भितरघात होने के बावजूद किसी भी पार्टी में फिलहाल ये मामले हलचल मचाते नहीं दिख रहे। इसके पीछे यही रणनीति मानी जा रही है कि भितरघातियों पर ज्यादा बवाल मचने से ईवीएम का मुद्दा कमजोर पड़ जाएगा।
राजनीति शास्त्र के एक जानकार का कहना है कि दरअसल एग्जिट पोल से जो रुझान सामने आया है, उसने गैरभाजपाई दलों की चिंता काफी बढ़ा दी है। इन दलों के नेताओं के मन में यह ख्याल हो सकता है कि पब्लिक में अगर उनका जनाधार कम होने का संदेश गया तो उन्हें भविष्य में और नुकसान हो सकता है। जो लोग उनके साथ हैं, वह भी खिसक सकते हैं। इसी वजह से सोची-समझी रणनीति के तहत अपनी हार की वजह ईवीएम को बताने की तैयारी हो रही है।