फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अनाथ बिटिया कविता का घर बसा तो सभी ने दीं दुआएं

विज्ञापन
विज्ञापन
बरेली। जब दहेज की आग में बेटियां झुलस रहीं हैं। वैवाहिक आयोजनों पर लाखों रुपये की बर्बादी हो रही है, ऐसे में शहर के एक युवा ने अनाथालय में पली-बढ़ी युवती को हमसफर बनाने का निर्णय लिया। उसने दहेज और विवाह पर फिजूलखर्ची रोकने के अपने संकल्प को अनाथ युवती से विवाह कर पूरा किया। अनाथ बेटी को घर-द्वार मिला तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा।
विज्ञापन

सुभाषनगर की राजीव कॉलोनी निवासी भगवान दास की आशीष चॉक उद्योग के नाम से चॉक बनाने की फैक्ट्री है। उनके बेटे सुरेश कुमार ने अनाथालय की कविता को रविवार को अग्नि को साक्षी मानकर अपना जीवनसाथी बना लिया। किसी अनाथ बेटी को बहू बनाने के लिए 34 वर्षों बाद अनाथालय में कोई परिवार पहुंचा तो वहां जश्न का माहौल नजर आया। भगवान दास के परिवार को भी बधाइयां देने वालों का तांता लगा रहा। भगवानदास ने कहा, उन्हें धन की नहीं बहू की जरूरत थी। जो पूरी हुई है। वर सुरेश का कहना था कि दहेज के खात्मे के लिए तमाम सामाजिक संस्थाएं और समितियां अभियान चलाती हैं, लेकिन शायद ही इनके पदाधिकारियों में कोई ऐसा हो जिसके बेटे या बेटी की शादी में दहेज लिया, दिया न गया हो। सुरेश की मां रेशमा का कहना है कि बेटी पराया धन होती हैं। अनाथालय कि बेटियां भी तो किसी की बेटी ही है। जिसे उन्होंने बहू बनाया है, वह अब उनकी बेटी भी है। अनाथालय से ससुराल पहुंची दुल्हन को देखने के लिए सुरेश के घर पर लोगों का तांता लगा रहा।

अजनबियों में ‘अपनों’ की पहचान सिखाएंगे
कविता की सास रेशमा ने कहा कि अनाथालय में कविता को रिश्ते, नातों की जानकारी नहीं मिली होगी। पग-पग पर वह उसकी मदद के लिए तैयार रहेंगी। घर में उसे पहली बार हर कोई अजनबी नजर आएगा, लेकिन ससुराल में किससे, कैसे, कब और कितनी बात करनी है या कैसा व्यवहार करना है, यह सब सिखाया जाएगा।
विज्ञापन


अक्सर सोचती थी- क्या कभी मेरा भी ‘घर’ होगा
कविता ने कहा कि जब वह अनाथालय में थी और दूर कहीं गुजरती हुई बारात का शोर, शहनाइयों की धुन कानों में पहुंचती तो उदास हो जाती। सोचती- क्या कभी उसका घर बस पाएगा। उसके हिस्से भी किसी का प्यार आएगा। सुरेश के संकल्प और ससुराल की रजामंदी से न केवल घर बस गया, बल्कि माता-पिता के रूप में सास-ससुर भी मिल गए। ससुराल में कदम रखा तो सब कुछ अनजाना सा लगा। एलईडी टीवी, केबल, फ्रिज, खुबसूरत पलंग, डाइनिंग हाल, किचन, करीने से रखा साजो सामान सब कुछ उसके लिए अजूबा ही था। थोड़ी ही देर में सब अपने लगने लगे। बोली- ईश्वर से यही कामना है कि हर अनाथ बेटी को मुझ जैसा ही सौभाग्य मिले।

1984 से नहीं बसा किसी अनाथ का घर
आर्य समाज अनाथालय के मैनेजर अमृतलाल नागर ने बताया कि वर्ष 1984 में अनाथालय में पली बढ़ी बेटी का घर बसा था। उसके बाद से अब तक किसी बेटी का घर नहीं बसा है। कुछ लड़कियां खुद शादी नहीं करना चाहतीं तो कइयों की शादी का विज्ञापन दिया गया लेकिन किसी ने संपर्क नहीं किया। कविता का विवाह तय होने के बाद कुछ दिन पहले दो और लड़कियों की शादी के लिए विज्ञापन दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें