बरेली मंडल में महामारी का रूप ले चुके फैल्सीपेरम मलेरिया के पैरासाइट बंदरों में भी मौजूद हैं। संक्रमित मच्छर सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बंदरों को भी काटकर संक्रमित कर रहे हैं। दरअसल, स्वास्थ्य विभाग को यह संदेह मलेरिया की रोकथाम के लिए किए जा रहे उपायों के कारगर न होने से हुआ है। स्वास्थ्य विभाग ने आईवीआरआई के वैज्ञानिकों से फैल्सीपेरम मलेरिया से सर्वाधिक प्रभावित आंवला तहसील में बंदरों में खतरनाक फैल्सीपेरम पैरासाइट पर रिसर्च के लिए मदद मांगी है। एडी हेल्थ डॉ. प्रमिला गौड़ ने आईवीआरआई के डायरेक्टर से पैरासाइट का व्यवहार पहचानने में मदद करने का आग्रह किया है, ताकि संक्रमित बंदरों को भी डोज दी जा सके।
स्वास्थ्य विभाग को आशंका है कि खतरनाक फैल्सीपेरम मलेरिया का पैरासाइट बरेली में अरिल नदी के आसपास के इलाके में पहले से मौजूद था। बारिश और मुफीद तापमान मिलने पर यह तेजी से फैलता चला गया। शुरुआत में बिशारतगंज के मझगवां, आंवला, भमोरा, फरीदपुर में इससे मौतें होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने इसे न तो गंभीरता से लिया और न ही वह समय रहते इसे डायग्नोस कर सका। लिहाजा इसने महामारी का रुप ले लिया। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की नींद तब टूटी जब बरेली के 10 ब्लॉकों के 109 गांव इसकी जद में आ गए। मंडल के एंटोमोलॉजिस्ट डॉ. दीपक कुमार के मुताबिक, एंटी लार्वा के लगातार छिड़काव और फॉगिंग के बावजूद फैल्सीपेरम मलेरिया के मरीजों में कमी नहीं आ रही है। ऐसे में यह संदेह लाजिमी है कि इस वायरस के मनुष्यों में ट्रांसफर होने का जरिया कोई और भी है। बंदरों के जरिये संक्रमण फैलने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। इन हालात में पहले आंवला तहसील के बंदरों पर रिसर्च करने का फैसला किया गया है, क्योंकि संक्रमित मच्छर इंसानों के साथ बंदरों को भी काटता है। बंदर घनी आबादी में लोगों के बीच ही मौजूद रहते हैं, लिहाजा उनसे वायरस ट्रांसफर होने का खतरा ज्यादा है। पैरासाइट का सटीक आंकलन करने के बाद आगामी सालों में रोकथाम में आसानी होगी।
आईवीआरआई के वैज्ञानिकों को रिसर्च करने के लिए पत्र लिखा गया है। बंदरों के जरिये संक्रमण फैलना जारी रहने की आशंका के बाद ऐसा किया गया है। बीते सालों में भी इस तरह के मामले मिलते रहे हैं। - एसपी अग्रवाल, ज्वाइंट डायरेक्टर हेल्थ