देश के सौ शहराें को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए केंद्र सरकार की योजना लगभग पूरी हो चुकी है। बरेली सौ शहराें में कहीं नहीं आया। हालांकि शहर चुनने से पहले इनको प्रतियोगिता की दौड़ में लाने के लिए सभी शहराें को अपने- अपने प्रोजेक्ट बनाने थे, इसके लिए एजेंसी को लगाया गया था। पहले चरण में केंद्र सरकार की ओर से बरेली को इंटरनेशनल कंसल्टेंट एजेंसी दी गई। जिन्होंने तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक का रामगंगा प्रोजेक्ट बनाकर दिया। दूसरे चरण में दारा शॉ एजेंसी को चुना गया जिन्होंने रेट्रोफिटिंग प्रोेजेक्ट बनाया। दोनों एजेंसी पर सवा चार करोड़ रुपये खर्च हुए जिसका भुगतान केंद्र सरकार ने किया। इन दोनों एजेंसी के कुछ अन्य शहर स्मार्ट सिटी में शामिल हो गए, लेकिन बरेली का बैडलक रहा कि इनका प्रोजेक्ट केंद्र को पसंद ही नहीं आया।
पहले चरण में इंटरनेशनल कंसल्टेंट एजेंसी ने दो करोड़ लेकर रामगंगा पर 3 हजार 400 करोड़ का ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट बनाया। उस समय कहा जा रहा था कि रिडवलपमेंट और रेट्रोफिटिंग से अच्छा ग्रीन फील्ड को मौका मिलेगा। रामगंगा की 670 एकड़ जमीन पर नया शहर बसाने का प्लान बनाया गया था, लेकिन बरेली 88वें नंबर पर आया। इसके बाद हैदराबाद की दारा शॉ एजेंसी को प्रोजेक्ट दिया गया। दूसरे चरण में इन्होंने रेट्रोफिटिंग को महत्ता दी। सिविल लाइंस में 500 एकड़ एरिया को आमूल चूल बदलाव करके संवारना था। इनका प्रोजेक्ट 1625 करोड़ रुपये का था। लेकिन यह भी फिसड्डी साबित हुआ। भुगतान लेकर एजेंसियां चली गई हैं लेकिन बरेली के बाशिंदे रो रहे हैं। इसमें भी नगर निगम की ओर से काफी पैसा स्वच्छता अभियान के बोर्ड और मीटिंग में खर्च किया गया है।
यह हो सकती है बाहर होने की वजह
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया था कि वह स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 1600 करोड़ रुपये से अधिक रुपये दिये जाने थे। लेकिन इसमें शर्त थी कि 877 करोड़ रुपये केंद्र सरकार देगी। करीब 457 करोड़ रुपये नगर निगम को कंवर्जेंस कास्ट से और 291 करोड़ रुपये निवेश से लाना था। जो प्रोजेक्ट बनाया गया उसमें राजस्व बढ़ाने पर जोर तो था लेकिन इसके धरातल पर उतरने की संभावना कम रही। निगम खुद विभिन्न स्रोतों से 135 करोड़ रुपये ही कमाता है जबकि खर्च तीन सौ करोड़ रुपये से अधिक करता है। ऐसे में केंद्र सरकार को भी इनके स्मार्ट सिटी बनने की संभावना कम लगी होगी।
एजेंसी को भुगतान केंद्र सरकार की ओर से किया गया था और इनका चुनाव भी केंद्र से ही हुआ। इन्होंने तो केवल हमारा प्रोजेक्ट बनाया, इसमें जो मदद चाहिए थी वह निगम ने की। हमारी बैठकों में ज्यादा खर्च नहीं हुआ।
डॉ. आईएस तोमर, मेयर
एजेंसी आई और लूटकर चली गई। दो दस- दस हजार रुपये वाले कर्मचारी बरेली में तैनात कर दिये जिन्होंने गूगल से देखकर काम किया। फील्ड पर गए ही नहीं। अलीगढ़ और झांसी से बरेली गंदा नहीं है। एजेंसी के मालिक तक यहां नहीं आए। कैसे स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट अच्छा बनता।
राजेश अग्रवाल, सपा पार्षद दल नेता