फतेहगंज पश्चिमी (बरेली)। गांव सिरसा जागीर निवासी 38 वर्षीय चंद्रभान सिंह उर्फ पिंटू अरुणाचल प्रदेश के चीन बार्डर के यंगसे (समांग) इलाके की बर्फ से ढकी पहाड़ियों में बेहद विषम परिस्थितियों में ड्यूटी करते हुए शहीद हो गए। अरुणाचल प्रदेश से एयरलिफ्ट कर शहीद का पार्थिव शरीर बरेली लाया गया। शनिवार शाम सैन्य-प्रशासनिक उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में नम आंखों से शहीद की उनके पैतृक गांव में अंत्येष्टि कर दी गई।
पांच राजपूताना राइफल्स में नायक चंद्रभान 18 साल पहले फौज में शामिल हुए थे। उनके पिता सूरजपाल सिंह भी फौजी थे और वर्ष 1984 में सूरतगढ़ (राजस्थान) में अग्रिम मोर्चे पर आतंकियों से लोहा लेते हुए दुश्मन की ओर से फेंका बम फटने से शहीद हो गए थे। आठ जून को दिन में डेढ़ बजे ड्यूटी के दौरान ही चंद्रभान सिंह को अचानक दिल का दौरा पड़ा। एयरलिफ्ट कर उन्हें अरुणाचल के सैन्य हास्पिटल में लाया गया लेकिन डाक्टर उन्हें बचा नहीं सके। सैन्य सूत्रों के अनुसार, विषम परिस्थितियों वाले तैनाती स्थल पर सामान्य परिस्थितियों में भी मृत्यु होने पर सैनिक को शहीद का ही दर्जा दिया जाता है। चंद्रभान चार भाइयों में तीसरे नंबर के थे। बड़े भाई कमल सिंह भी इंडियन आर्मी में हैं और पुणे में तैनात हैं। दूसरे नंबर के इंद्रजीत सिंह और चौथे नंबर के गजेंद्र सिंह गांव में ही खेतीबाड़ी करते हैं। पहले पति और अब बेटे की शहादत का दंश झेल रही रेशमवती की तो मानों आंखें पथरा ही गई थीं। पत्नी पंकज कुमारी भी बार-बार पति के शव पर पछाड़ें खा रही थीं। दो बेटियों भूमि (6), धनिष्का (2) का भी रो-रोकर बुरा हाल था। तिरंगे में लिपटे शहीद का शव बरेली पहुंचने पर जाट रेजिमेंट में उन्हें परंपरागत गार्ड आफ आनर दिया गया। गांव सिरसा जागीर में एडीएम, एसपी क्राइम जोगेंद्र लाल, एसडीएम मीरगंज राजेश कुमार भी पहुंचे और शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया। शाम के वक्त केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार, विधायक डा. डीसी वर्मा भी पहुंचे और शासन-प्रशासन से हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया।
बर्फीली ठंड और पहाड़ी जोंकों से जूझते हैं जवान
समुद्र तल से 18780 फुट ऊंची अरुणाचल की बर्फीली पहाड़ियों में राजपूताना राइफल्स के जवानों की तैनाती बेहद कष्टदायक है। बताया गया कि चंद्रभान इन दिनों अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ 24 अप्रैल 2017 से 14 जुलाई 2017 तक चलने वाली लांग रेंज पार्टी (एलआरपी) ट्रेनिंग में बिजी थे। बारहों महीने बर्फ से ढकी रहने वाली पहाड़ियों पर इन सैनिकों को बेहद ऊंचा मनोबल और अटूट राष्ट्रभक्ति का जज्बा ही जिंदा रख पाता है। पहाड़ी जोंक अक्सर जैकेट के अंदर घुस जाती हैं। इनके काटने से जो असहनीय पीड़ा होती है, उसे सख्त अनुशासन की डोर से बंधे ये सैनिक ही समझ सकते हैं। पैक्ड फूड भी कई किमी नीचे से बेस कैंप पर एयरलिफ्ट कर पहुंचाया जाता है।