बरेली। लोकसभा चुनाव की सरगर्मी जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, उसी तरह टांग ख्ंिाचाई भी बढ़ रही है। कुछ बड़े और छुटभैये राजनीति दलोें ने पुराने स्थापित साख वाले नेताओं को डुबोने के लिए अपने पत्ते फेंटने शुरू कर दिए हैं। उनका मकसद है कि भले ही वह स्वयं जीतने की स्थिति में न हों, लेकिन पुराने साख वाले नेताओं को भी ले डूबने का मकसद हल करके रहेंगे।
सबसे पहले बात बरेली लोकसभा सीट की। यहां भाजपा, सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के पुराने स्थापित नेता कड़े त्रिकोणीय मुकाबले में चुनाव लड़ रहे हैं। कभी भी बरेली लोकसभा सीट पर कब्जा न कर पाने वाले सपा-बसपा गठबंधन ने ऐसा प्रत्याशी लाकर खड़ा किया है, जो भाजपा के जमे हुए नेता जी को चुनौती पेश कर रहा है। दस साल पहले गठबंधन के नेता ने इसी तरह लोकसभा चुनाव में ताल ठोंककर पुराने साख वाले नेता के राजनीतिक समीकरण बिगाड़ दिए थे। वही नेताजी इस बार फिर से ताल ठोंककर मैदान में हैं। समाजवादी पार्टी से निकले एक नए राजनीतिक दल ने युवा प्रत्याशी उतारकर पुराने साख वाले नेताओं के राजनीतिक समीकरण बिगाड़ने शुरू कर दिए हैं। युवा प्रत्याशी के ग्लैमर से वोट भले ही मिले या न मिलें, लेकिन भीड़ तो जमा हो ही रही है। इतना ही नहीं, नए नवेले दल के नए युवा प्रत्याशी जिस वर्ग के वोट के समीकरण लेकर मैदान में है, उससे कम से कम पुराने साख वाले नेताओं पर असर पड़ सकता है।
दूसरे नंबर पर बात आंवला लोकसभा सीट की। दूसरी बात संसद भवन पहुंचने के लिए किस्मत आजमा रहे नेताजी की राह में तीन बार के सांसद रहे नेताजी कद्दावर नेता जी के अलावा सपा-बसपा गठबंधन की संयुक्त प्रत्याशी ने राह में रोड़े बिछा दिए हैं। इनमें हालांकि सबका मकसद चुनाव जीतना ही है, मगर अपने समीकरण न बनने पर उनकी दूसरी पसंद अपने प्रतिद्वंद्वी को ले डूबना है। सपा-बसपा गठबंधन से लोकसभा टिकट के एक दूसरे दावेदार थे, लेकिन नंबरों की दौड़ में पिछड़ने की वजह से टिकट मिल गया बाहरी प्रत्याशी को। स्थानीय दावेदार हाथ से खिसकती मलाई देखकर पहले तो छटपटाकर रह गए। मगर अब वह सपा से ही निकले एक नए दल से टिकट लेने की जुगाड़ में लग गए हैं। इन नेताजी का मकसद है कि भले ही उनका चुनाव न रह गया हो, लेकिन वह छोटे दल से मैदान में आकर बड़ों के समीकरण बिगाड़कर अपनी हैसियत तो बता ही सकते हैं। माना जाता है कि उनकी इस संबंध में नए दल के अध्यक्ष और दूसरे स्थानीय कद्दावर नेता से टिकट की बात हो चुकी है। बस, एक या दो दिन में उनका टिकट हो सकता है। फिर वह भी त्रिकोणीय मुकाबले को चौकोणीय बनाने की कोशिशों में जुटेंगे और पुराने साख वालों का बना बनाया खेल बिगाड़ेंगे। फिलहाल, बरेली और आंवला लोकसभा सीट पर न जीत सकने वाले कुछ प्रत्याशियों ने अपनी फील्डिंग इस तरह सजा रखी है, ताकि उनका खेल भले ही न बन पाए, लेकिन जो पुराने धुरंधर जमे हैं, उनका भी खेल बिगड़ जाए।