चौकी चौराहा पर गुब्बारे बेचने वाले मासूम अब उनसे खेल पाएंगे
0 बाल कल्याण समिति और आशा ज्योति केंद्र की पहल से तीनों जाएंगे आर्य समाज अनाथालय
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली।
चौकी चौराहे पर गुब्बारे बेचने वाले बच्चों से शायद ही कोई परिचित न हो। नंगे पैर, फटे कपड़े पहने ये बच्चे तेज ठंड से लेकर अब कड़ी धूप में भी चौराहे पर लोगों से गुब्बारे खरीदने की विनती करते मिल जाते। फुटपाथ पर बैठीं उनकी दिव्यांग मां गुब्बारे फुलाकर बच्चों को देतीं रहतीं। पर अब बच्चों के जीवन को नई आशा मिल रही है, गुब्बारे बेचकर पेट पालने की अब उन्हें जरूरत नहीं होगी। बाल संरक्षण समिति और आशा ज्योति केंद्र की पहल पर पांच में से तीन बच्चों को आर्य समाज अनाथालय में दाखिला कराया जा रहा है। पर अपने दिल के टुकड़ों को अनाथालय भेजने के फैसले पर दो महीने सोच विचार के बाद सहमत हुई है। बाल संरक्षण अधिकारी यह भी कह रही हैं कि महिला को बच्चों से गुब्बारे न बिकवाने पर राजी कर लिया गया है। अब सबसे बड़ी बेटी और सबसे छोटे बेटे के साथ वह अपना जीवन किस तरह जिएगी, इसका अफसरों के पास कोई जवाब नहीं।
आर्य समाज अनाथालय में रहेंगे तीन बच्चे
रामगंगा कालोनी में रह रही विकलांग सोना का संघर्ष नाकारा पति के साथ शुरू हुआ। पांच बच्चों को विकलांग सोना जैसे तैसे गुजारा करके पालती आई है। कुछ महीनों से सोना बच्चों के साथ गुब्बारे बेचकर काम चलाने लगी। जनवरी में डीपीओ और श्रम विभाग ने अभियान चलाकर गुब्बारे बेचने वाले बच्चों को पकड़ा था। बाद में इन बच्चों के पारिवारिक स्थिति पता की गई। डीपीओ के आदेश पर काउंसलर सीमा और बाल कल्याण समिति की सोशल वर्कर नूपुर ने सोना को समझाया। महीने भर विचार करने के बाद सोना तीन बेटों को अनाथालय भेजने के लिए तैयार हो गई। अब बृहस्पतिवार को तीनों बच्चों को जिला बाल कल्याण समिति के सामने पेश करके आर्य समाज अनाथालय भेजा जाएगा।
कहां है यह योजना
नियम है कि श्रम विभाग और जिला प्रोवेशन अधिकारी की ओर से होने वाली कार्रवाई में श्रम करने वाले बच्चों का पुनर्वास कराया जाए। इसके लिए बच्चों का स्कूलों में दाखिला कराना और उनकी आर्थिक स्थिति को समझते हुए उन्हें भरण पोषण के लिए मासिक अनुदान दिलाए जाने का प्रावधान है। पर अधिकारी ऑपरेशन मुस्कान और दूसरे अभियान चलाकर होटल और भीख मांगते बच्चों को रेसक्यू तो करा लेते हैं पर उनके पुनर्वास पर किसी का ध्यान नहीं। इस केस में भी सोना किस तरह अपना खर्च चलाएगी, के बारे में अफसरों ने नहीं सोचा।