बरेली। जिस समाज में स्त्रियों को को स्वतंत्रता हासिल न हो, वह समाज सुखी नहीं हो सकता। अगर स्त्रियां शर्म-संकोच और भय के अधीन हैं तो उनका जीवन भर दुखी रहना तय है और जहां स्त्रियां दुखी होंगी, वहां लक्ष्मी का वास नहीं हो सकता। संत मोरारी बापू ने शुक्रवार को रामकथा में राम-रावण के युद्ध का प्रसंग सुनाते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि यह युद्ध धर्म और अधर्म का था, जिसे सुर-नर और मुनियों ने ही नहीं देखा बल्कि खुद महाकाल यानी भगवान शिव भी देखने पहुंचे थे। संत ने कहा कि जो लंका कांड का अर्थ समझ जाता है, वह बुद्ध कहलाता है। बुद्ध धर्म का प्रचार सबसे पहले इसीलिए श्रीलंका में हुआ था।
संत मोरारी बापू ने ‘पराधीन सपनेहू सुख नाहीं’ की व्याख्या करते हुए कहा कि जो किसी के अधीन है वह कभी सुखी नहीं रह सकता। एकमात्र प्रेम ऐसा बंधन है जो एक-दूसरे रहकर भी सुख प्रदान करता है। कभी-कभी तो मनुष्य खुद ही छोटी-छोटी समस्याओं को इतना बड़ा बना लेता है कि उनके अधीन होकर रह जाता है। समस्याएं कितनी ही बड़ी क्यों न हों, उन्हें तर्क शक्ति से परखकर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। समस्याएं आने पर उन्होंने श्रीराम के परिवार का अनुसरण करने का सुझाव दिया। कहा, सीता का अपहरण, श्रीराम को वनवास, लक्ष्मण का जंगल में भटकना, भरत का राजगद्दी स्वीकार न करना, कैकेयी का विलाप, माता कौशल्या और सुमित्रा के कष्ट जैसी कई समस्याएं श्रीराम परिवार में रहीं, फिर भी वह सब मिलजुलकर रहे।
कलयुग में सत्संग से कटते हैं पाप
मोरारी बापू ने बताया कि साधक की छोटी-मोटी गलतियों को प्रभु माफ कर देते हैं। संसार में ‘मानस अपराध’ तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनसे युवाओं को बचाना बहुत जरूरी है। कलयुग में सत्संग ही ऐसा तरीका है जिससे पाप कटते हैं। समाज और संस्कृति के प्रति प्रेमभाव जगता है। उन्होंने कहा कि अगर सच्चा साधु पाप करना भी चाहे तो नहीं कर सकता क्योंकि पाप खुद उससे दूर रहता है। अगर, किसी साधु से पाप हो जाए तो इसका अर्थ है कि वह साधु नहीं है। सती ने छह अपराध किए, लेकिन प्रभु ने सब क्षमा कर दिए।
कथा मां समान, अनसुना करना अपराध
मोरारी बापू ने कहा कि कथा मां के समान होती है, मां को अनसुना करने वाले पाप के भागीदार होते हैं। कथा के पंडाल में कई लोग सिर्फ प्रसाद लेने आते हैं तो कोई खाने के लिए आता है। कुछ लोग पंडाल देखने आते हैं। कुछ कथा के दौरान खर्च रकम पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो कुछ मजा लेने आते हैं। इसलिए कथा में उनका मन नहीं रमता और फिर कथा पंडाल में मौजूद होने को ही कथा सुनना मान लेते हैं।