उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता को उलमा मजहबी आजादी के खिलाफ मान रहे हैं। बरेलवी और देवबंद दोनों ही मसलक के उलमा ने इसे गैर जरूरी बताते हुए खुल कर मुखालफत की है। इस मामले में बरेलवी मसलक के संगठन तंजीम उलमा इस्लाम ने मुख्यमंत्री को पत्र भी भेजा है।
तंजीम उलमा इस्लाम की ओर से महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजा है। इस पत्र में विवाह पंजीकरण के मामले में ध्यान आकर्षित किया गया है। कहा गया है कि मुस्लिम समाज में बरसों से ‘निकाहनामा’ की व्यवस्था चली आ रही है। ये निकाहनामा खुद अपने आप में एक पंजीकरण की हैसियत रखता है। हूकूमत इस मुद्दे पर आज सोच रही है, मगर उलमा ने सालों पहले से पंजीकरण की व्यवस्था बना कर अमलीजामा पहना दिया था। इस लिए नए पंजीकरण को जरूरी करार न दिया जाए। व्यक्ति को उसके विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। साथ ही इस मुददे पर वार्ता के लिए मिलने का समय भी मांगा है।
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इधर देवबंद मसलक से जुड़े संगठन जमीयत उलमा हिंद के जिलाध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद मियां कासमी ने इस्लाम में निकाह के मायने समझाते हुए पंजीकरण की व्यवस्था को गैर जरूरी करार दिया है। उन्होंने कहा कि निकाह नाम इजाब और कुबूल का है, दो गवाहों के सामने। अगर दो गवाहों के सामने दूल्हा दुल्हन ने निकाह कुबूल कर लिया है तो निकाह हो जाता है। उन्होंने बताया कि निकाह ऐसी चीज है जिसमें मजाक में कहा जाए या गुस्से में कहा जाए, किसी हालत में भी हो तो निकाह हो जाया करता है। यहां तक कि उसको लिखा जाए या न लिखा जाए शरई लिहाज से निकाह हो जाएगा है। उसके लिए पंजीकरण को लागू करना जबरदस्ती है।
उन्होंने कहा का शादी पंजीकरण को जबरदस्ती से लागू करना कानून में दी गई मजहबी आजादी के खिलाफ है। मजहब इस्लाम में इसको लाजिम नहीं समझा गया है। अगर किसी वजह से शादी का पंजीकरण कराना जरूरी हो जाए तो सब के लिए लाजिम और जरूरी नहीं होना चाहिए।