बरेली। ‘किसी स्थान पर प्रदूषण बढ़ते ही सबसे पहले काई (लाइकेन) खत्म होती है। क्योंकि काई बेहद नाजुक होती है, जो हानिकारक केमिकल के संपर्क में आते ही सूखने लगती है। पुराने समय में काई के खत्म होने पर ऋषि मुनि संबंधित स्थान पर अनिष्ट की आशंका जताते थे। प्रदूषण के स्तर को नापने का काई उपजाने से बेहतर और कोई साधन नहीं हो सकता।’ यह जानकारी बॉटेनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. डीके उप्रेती ने बरेली कॉलेज सभागार में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में रविवार को दी।
मुख्य वक्ता उप्रेती ने पर्यावरण प्रदूषण के संकेत के रूप में काई की उपयोगिता पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। कहा, काई खत्म होने का सीधा अर्थ प्रदूषण का बढ़ना है। लंदन के एक शोध पत्र में काई के खत्म होने से श्वांस और चर्म रोगों में बढ़ोतरी का दावा किया गया है। कहा, लाइकेन के आकार और रूप में हुए बदलाव से पत्थरों के काल अवधि की गणना भी की जा सकती है। जिसका उदाहरण उन्होंने ‘डिजिटल इवैल्यूएशन मॉडल’ के जरिए हिमालय क्षेत्र में पाई जाने वाली लाइकेन से दिया। बताया कि उप्र के लखनऊ, रायबरेली, ऊंचाहार, पनकी समेत अन्य जिलों और बंग्लूरु, मुंबई, कोलकाता, दिल्ली में हुई रिसर्च में कहीं भी काई नहीं मिली। बताया कि उत्तर प्रदेश के ज्यादातर शहरों के 9 से 20 किलोमीटर तक की परिधि से काई लुप्त हो चुकी है। कारण, प्रदूषण का बढ़ना है। कहा, ऋषि मुनि काई के फायदे जानते हुए उसे औषधि के रूप में उपयोग करते थे।
बगैर स्वीकारे रिसर्च का क्या फायदा
रविवार को पर्यावरण विज्ञान विभाग के तत्वाधान में 13 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। ‘इंवोरिमेंटल इश्यू एंड चैंलेंजेज इन 21 सेंचुरी (ईआईसीसी 2019)’ विषय पर आधारित सेमिनार में मुख्य अतिथि और कानपुर विवि की कुलपति प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता ने कहा कि जब तक समाज स्वच्छता और शुद्ध पर्यावरण को अंतरात्मा से नहीं स्वीकारेगा, रिसर्च का कोई फायदा नहीं है। इस दौरान बरेली कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अजय शर्मा मौजूद रहे।
बेस्ट प्रेजेंटेशन से नवाजे गए छात्र
बीएचयू के शेख आदिल इदरीसी और एएमयू के नेपाल सिंह को बेस्ट प्रेजेंटेशन अवार्ड मिला। तजाकिस्तान से आए ओरिखोनोवा, नाजिमखोनोवा ने बढ़ते तापमान का फसलों पर प्रभाव पर, नेपाल से आए बिचित के सिंह ने जैव विविधता पर, केन्या से म्यात सू मून, हंगरी से श्रेया भट्टाचार्य, जेनी जोस, तमस ने पौधों पर अजैविक तनाव पर शोध पत्र प्रस्तुत किए। अफगानिस्तान से मोहम्मद अकरम नासारी ने भी पर्यावरण संबंधी अपनी बात रखी। हंगरी, केन्या, नेपाल से 6 ऑनलाइन व्याख्यान हुए। यहां डॉ. अनुराग मोहन भटनागर, डॉ. निष्ठा सेठ, श्रुति शर्मा, डॉ. एपी सिंह, प्रभारी पर्यावरण विज्ञान विभाग डॉ. डीके गुप्ता आदि मौजूद रहे।
वैज्ञानिक काई को कहते हैं ‘शैक’
लाइकेन यानी काई को वैज्ञानिक ‘शैक’ कहते हैं, जो शैवाल और कवक का मिलाजुला रूप है, जो सिर्फ शुद्ध वातावरण में ही उगती है। प्रदूषण के कारक जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन, नैफ्थेलीन, फ्लुरेथीन, पायरीन, नाइट्रोजन आदि के संपर्क में आते ही नष्ट हो जाती है।