बरेली। स्वास्थ्य विभाग के एक्टिव केस फाइंडिंग अभियान के दौरान टीबी के कुछ गंभीर मरीज सामने आए हैं। यह मरीज अब तक गली-मोहल्लों मेें झोलाछाप से इलाज कराते रहे, जिस कारण बीमारी गंभीर हो गई। डॉक्टरों ने बताया कि टीबी के इलाज में कुछ दवाइयां एक साथ दी जाती हैं, जो बैक्टेरिया पर सक्रियता से असर करती हैं। मगर झोलाछाप टीबी के बजाय उसके लक्षणों की ही दवा देते रहते हैं, जिससे बैक्टेरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और वो और ज्यादा सक्रिय हो जाता है, जिसके बाद इलाज के लिए दी गईं तेज दवाएं दिल और दिमाग पर असर करती हैं।
पहले दिन चले अभियान के दौरान आठ टीबी के मरीज मिले हैं। इनमें से तीन क्लीनिकल डॉयग्नोज से मिले हैं। इनमें फेफड़े की टीबी का पता लगा। ऐसे केस में मरीजों के गला, बगल, पेट आदि में गांठ बन जाती है। इसके अलावा पांच स्पुटम डॉयग्नोज से मिले। इनमें बलगम की जांच से टीबी का पता लगाया गया। अभियान के दूसरे दिन करीब 22 सैंपल लिए गए। कालीबाड़ी में काम कर रही टीम नंबर नौ ने एक गंभीर मरीज खोजकर इलाज शुरू किया।
गलत दवाएं खाने पर टीबी के बैक्टेरिया पर असर खत्म हो जाता है। बीमारी की गंभीरता के हिसाब से फिर दवा देनी पड़ती है। नई जनरेशन की दवाएं बैक्टेरिया पर असर करने के साथ ही दिल पर भी असर करती हैं।
- डॉ. वागीश वैश्य