बरेली। इन बेटियाें और महिलाओं अपराजिता कहना ज्यादा बेहतर होगा। हो भी क्यों न.. विषम परिस्थितियों के बीच इन्होंने न केवल खुद को संवारा बल्कि बेहतर तरीके से स्थापित कर देश, समाज और परिवार का मान बढ़ाया। समाज के लिए काम करके नजीर बनीं तो देश के लिए काम करके परिवार को सिर भी गर्व से ऊंचा किया। खेल का मैदान हो, खेत हो या फिर समाज, अपनी हिम्मत और हौसेले का लोहा मनवाने ये अपराजिताएं कहीं भी नहीं चूकीं। महिला दिवस पर ऐसी अपराजिताओं के हौसले को सलाम।
आर्थिक तंगी से जूझकर बॉक्सिंग रिंग तक पहुंचीं अंजलि
बरेली कॉलेज में बीए की छात्रा अंजलि प्रजापति का परिवार बेहद गरीब है। पिता राकेश अशक्त हैं। मां मनसा देवी सब्जी बेचकर घर का गुजारा करती हैं। आर्थिक तंगी से जूझकर आज अंजलि बॉक्सर बन चुकी है। रिंग में उनके मुक्कों ने अच्छे-अच्छों के दांत खट्टे किए हैं। अंजलि दो बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी बॉक्सिंग चैंपियनशिप खेल चुकी है। अलीगढ़ में हुई प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था। इन दिनों वह इंडिया कैंप कर रही थीं। अंजलि को प्रैक्टिस के लिए बेहतर सुविधाएं नहीं मिल सकीं। स्टेडियम के कोच शहवर अली की देखरेख में उन्होंने बॉक्सिंग सीखी। अंजलि का सपना है कि वह इंटरनेशनल लेवल खेलें और देश के लिए मेडल जीतें।
फुटबॉल में अलीशा ने बनाया अलग मुकाम
पीलीभीत की अलीशा बरेली मंडल से कई बार नेशनल स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं। मुसीबतों को उन्होंने कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। दस साल में उन्होंने फुटबॉल में खास मुकाम हासिल किया है। पिता विकास कुमार आधार कार्ड सेंटर चलाते हैं। दसवीं की छात्रा अलीशा तीन बार नेशनल खेल चुकी हैं। 2017 में प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था। अब उनका सपना नेशनल टीम का हिस्सा बनने का है।
मीमांसा ने राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियनशिप में दिखाया दम
कोहाड़ापीर की मीमांसा पांडेय को मोहाली में हुई राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियनशिप में खेलने का मौका मिला। उनका सपना मैरी कॉम जैसी बॉक्सर बनना है। पिता अनूप पांडेय ने हमेशा उनका साहस बढ़ाया। एटा में हुई प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता। अच्छे प्रदर्शन के दम पर उनका चयन कैंप और फिर नेशनल चैंपियनशिप के लिए हुआ।
सपना और मुस्कान ने अपने दम पर सीखी कुश्ती
आर्थिक तंगी के चलते सपना पाल और मुस्कान को बेहतर प्रशिक्षण नहीं मिला। दंगल फिल्म देखकर उन दोनों में रेसलर बनने का ख्वाब जागा। दोनों ने खुद प्रैक्टिस करने की ठानी। घर में ही दोनों ने प्रैक्टिस की। पहले जिला स्तर और फिर मंडल स्तर पर चयन हुआ। दोनों ने प्रदेश स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में मेडल जीते।
आकृति ने हॉकी में दिखाया कमाल
संजय नगर सैनिक कॉलोनी की आकृति मिश्रा का सपना हॉकी खिलाड़ी बनने का है। वह कई स्टेट चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुकी है। झांसी, लखनऊ में हुई प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में खेलीं। अब उनका सपना नेशनल टीम का हिस्सा बनना है।
एशियन गेम्स खेली शहर की चार बेटियां
पिछले साल जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में शहर की बेटियों ने जगह बनाई। बरेली की मनीषा, डॉली, रश्मि और खुशबू भारतीय महिला सेपक टाकरा टीम का हिस्सा बनीं। चारों ही बरेली कॉलेज की छात्रा रहीं और साई सेंटर में कोच बीए शर्मा की देखरेख में प्रैक्टिस की। रश्मि और खुशबू एसएसबी में हैं।
खेती करके औरों के लिए प्रेरणा बनी माला देवी
बरेली। भोजीपुरा के गांव भगवंतापुर की पांचवीं पास माला देवी का संयुक्त परिवार था। 20 साल पहले भाइयों में बंटवारा हुआ तो पति रामवीर के हिस्से में 10 बीघा जमीन और घर का छोटा सा टुकड़ा आया। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए माला ने खुद ही खेती की कमान संभाली। 15 साल पहले लोग महिलाओं को चौका चूल्हा तक ही सीमित समझते थे, खेती या अन्य कार्य करने की कल्पना करना तक उनके लिए आसान नहीं था। फिर भी माला ने हार नहीं मानी, इन सबको दरकिनार कर खेती शुरू की। शुरुआती दौर में उन्हें लोगों की काफी खरीखोटी सुननी पड़ी, लेकिन उनके हौसले कम नहीं हुए। माला ने पति और दो बच्चों के साथ धान, गेहूं और गन्ने की बेहतर फसलें ही नहीं उगाई, बल्कि पशुपालन करके भी परिवार की आय में कई गुना बढ़ोतरी की। आमदनी बढ़ी तो साझे में ट्रैक्टर भी खरीद लिया। माला का मानना है कि अपने काम में हिचक कैसी। अब उनको देखकर गांव की अन्य महिलाएं भी खेती करने लगी हैं।
मॉडल शौचालय बनवाकर जगाई स्वच्छता की अलख
बरेली। भुता की प्रधान बबली देवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए स्वच्छ भारत मिशन में बढ़ चढ़कर भागेदारी की। उन्होंने न केवल 12 हजार की आबादी वाले कस्बा भुता में लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया, बल्कि स्कूल में पंचायत की आय से पैसा एकत्र कर 11 लाख से अधिक लगाकर कान्वेंट स्कूलों की तर्ज पर मॉडल शौचालय बनाकर मिसाल पेश की।
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शासन से प्रोत्साहन राशि 12 हजार रुपये ही मिलती है। भुता के प्राइमरी और जूनियर स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय नहीं थे। प्रधान बबली देवी ने कान्वेंट स्कूलों की तर्ज पर छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग मॉडल शौचालय बनवाए। इतना ही नहीं, बबली ने बाउंड्रीवाल बनवाकर स्कूल का सौंदर्यीकरण किया, ताकि वहां पढ़ाई का माहौल बन सके। अब वह पंचायत की आय बढ़ाकर भुता को स्वच्छता और विकास पथ पर आगे ले जाने के प्रयास में लगी हैं।
रजनी जोशी दीक्षित, इंडिया खिलाड़ी
खेल के बाद नौकरी में भी दिखाई ताकत
मूलरूप से अल्मोड़ा निवासी रजनी जोशी दीक्षित अब महानगर में रहती हैं। आप इंडियन हॉकी टीम की सदस्य रह चुकी हैं और रेलवे के अकाउंट विभाग में सेवारत हैं। खेल के मैदान पर अपना दमखम दिखाने के बाद रजनी जोशी दीक्षित अब अपनी नौकरी के क्षेत्र में भी झंडे गाड़ रही हैं। आप ने 1990 में एशियन गेम्स में प्रतिभाग किया। 1986-1991 तक हॉकी में भारत का प्रतिनिधित्व किया। एशिया कप, इंदिरा गांधी गोल्डन कप, इंटर कांटिनेंटल कप, इंडियन नेशनल कप आदि खेल चुकी हैं। इसके बाद रेलवे की नौकरी में आने के बाद भी अपना लोहा मनवाते हुए कार्यकुशलता के लिए जीएम अवार्ड, डीआरएम अवार्ड और एफएएनसीओ अवार्ड आदि हासिल कर चुकी हैं।
नौकरी के बाद अब जोड़ रहीं रिश्ते
मूलरूप से उत्तराखंड में जिला चमोली के गांव रतूड़ा निवासी उमा रतूड़ी अब कूर्मांचल नगर में रहती हैं और स्थानीय पर्वतीय समाज के बीच अहम स्थान रखती हैं। कूर्मांचलनगर में मंदिर कमेटी की अध्यक्ष भी हैं। बेसिक शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापक के पद से रिटायर होने के बाद उता रतूड़ी ने समाज के लोगों को जोड़े रहने का बीड़ा उठा लिया। क्षेत्र में रतूड़ी आंटी के नाम से जानी जाने वाली उमा रतूड़ी को काउंसलिंग में महारत हासिल है। समाज में पति-पत्नी के बीच अगर विवाद की जानकारी उन्हें मिलती है तो वह पहुंच जाती हैं या किसी माध्यम से बुला लेती हैं। इसके बाद काउंसलिंग कर उनका मनमुटाव दूर रिश्ते में मधुरता लाती हैं।
इनसें सीखें हालात से लड़ना
उत्तराखंड में धूमाकोट, पौड़ी गढ़वाल की मूल निवासी सुधा रावत अब कूर्मांचल नगर में रहती हैं। कूर्मांचल नगर सोसाइटी की अध्यक्ष होने के साथ ही वह सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहती हैं। विषम परिस्थितियों से लड़ने की सीख लेनी है तो सुधा रावत एक अच्छा उदाहरण हैं। कुछ साल पहले उनके परिवार में एक हादसे में दो लोगों की एकसाथ मौत हो गई थी। उसी दौरान घर में शादी भी थी। यह दौर किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा मुश्किल होता है। मगर ऐसे में सुधा रावत ने हिम्मत दिखाई और सबकुछ संभालते हुए अपनी समझदारी का परिचय दिया। उनके इस हिम्मत भरे निर्णय को आज भी समाज के लोग याद करते हैं।
पहाड़ की बेटियों के उत्थान को बनाया रास्ता
मूलरूप से उत्तराखंड में बागेश्वर निवासी कौशल्या सिंह अब कूर्मांचलनगर में हो चुकी हैं। नर्सिंग के क्षेत्र में सक्रिय रहकर उन्होंने पूरे 60 साल मरीजों की सेवा की है और अब 80 वर्ष की होने के बाद अप्रैल 2018 में रिटायर हुई हैं। कौशल्या सिंह पहले सरकारी नर्स थीं और 35 साल सेवा नर्सिंग की ट्रेनिंग देने के बाद शहर के एक नर्सिंग कॉलेज से जुड़ गईं। इसके बाद उन्होंने नर्सिंग के क्षेत्र में पहाड़ की बेटियों को रास्ता दिखाना शुरू किया। उत्तराखंड से कई लड़कियों को बरेली लाईं और हरसंभव मदद करके उन्हें नर्सिंग का कोर्स कराकर आजीविका का साधन जुटाया। इस तरह उन्होंने पहाड़ की तमाम युवतियों के लिए तरक्की की रास्ता प्रशस्त किया।