कोटवाधाम/सूरतगंज (बाराबंकी)। गांवों में बाढ़ का पानी भर जाने के कारण यहां के लोग परिवारीजनों के साथ तटबंधों पर जिंदगी गुजार रहे हैं। लेकिन इधर कई दिनों से हो रही बारिश से पीड़ितों की दुश्वारियों को और बढ़ गई हैं। गीली हो गई लकड़ियाें और भीगे अनाज से बाढ़ पीड़ितों के सामने दो वक्त की रोटी जुटाने का संकट गहराता जा रहा है। मवेशियों के लिए चारा जुटाना भी बाढ़ पीड़ितों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है।
अलीनगर रानीमऊ तटबंध पर करीब 100 से ज्यादा परिवार बाढ़ के चलते तिरपाल और पन्नी के नीचे जीवन गुजार रहे हैं। बंधे पर रह रहे टेपरा निवासी रामसिंह और मितई बताते हैं कि बाढ़ ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। खेतों में लगी धान और गन्ने की फसल चौपट हो जाने से भविष्य को लेकर जो सपने देखे गए थे उन पर पानी फिर गया है।
बघौली पुरवा की आरती, कहारनपुरवा की सुमन ने बताया कि सरयू का पानी गांवों में भर जाने के कारण जल्दी में जो अनाज निकल पाया था, उसी से अभी तक काम चल रहा था। लेकिन इधर बारिश होने के कारण राशन भी भीग गया है और लकड़ियां भी गीली हो गई हैं। जिससे दो वक्त का खाना बनाने में काफी दिक्कतें हो रही हैं।
हेतमापुर तटबंध पर दिन काट रहे ओमकार, परगास, बदलू, जनक लाल, अनवर, छेदी, आलम और लालता आदि ने बताया कि तिरपाल और पन्नी के नीचे रातें गुजर रही हैं। ऐसे में तेज हवाओं और बारिश के चलते कितनी दिक्कतें होती हैं, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अक्तूबर माह में आई बाढ़ किसानों की उम्मीदों को अपने साथ बहा ले गई है। कहा कि दो वक्त की रोटी के साथ मवेशियों के लिए चारा जुटाना भी इस समय किसी चुनौती से कम नहीं है।