दरियाबाद के पतुलकी गांव में मधु मक्खियों की देख रेख करते दिनेश प्रसाद।
दरियाबाद। स्थानीय ब्लॉक क्षेत्र के गांवों में इन दिनों बिहार के स्वरोजगारी डेरा जमाए हैं। यहां के शहद की मिठास उन्हें खींच लाती है। सरसों व यूकेलिप्टस के फूलों के कारण मधुमक्खी पालन करने वाले स्वरोजगारी यहां आते हैं। इन फूलों का शहद काफी स्वादिष्ट माना जाता है। इसलिए स्वरोजगारी यहां खिंचे चले आते हैं। बिहार के, विशेषकर मुजफ्फरपुर जिले के मधुमक्खी पालक ट्रकों में मधुमक्खी के डिब्बे लेकर दिसंबर माह के पहले हफ्ते में आते हैं।
मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर निवासी दिनेश प्रसाद, राम सेवक व चंदन जेठौती कुर्मियान गांव के पास खाली पड़ी जमीन पर मधुमक्खी के लगभग 250 डिब्बों को रखे हुए हैं। दिनेश ने बताया कि दिसंबर में यहां आने के बाद फरवरी तक अच्छा शहद तैयार हो जाता है। इसके बाद, वे वापस बिहार चले जाते हैं, जहां वे लीची के फूलों से शहद एकत्र करते हैं। राम सेवक बताते हैं कि यहां तीन महीने उनके लिए शहद उत्पादन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
बिहार में यूकेलिप्टस के पेड़ों की पर्याप्त उपलब्धता न होने और सरसों की खेती कम होने के कारण, वहां के मधुमक्खी पालकों के लिए बाराबंकी एक आदर्श स्थान साबित हो रहा है।
मेहनत का फल, मुनाफे का सौदा :
दिनेश प्रसाद के अनुसार उन्होंने मधुमक्खी के 50 डिब्बों से अपने कारोबार की शुरुआत की थी। अब ढाई सौ डिब्बे हैं। यहां आने से उन्हें लगभग एक लाख रुपये का शुद्ध लाभ होगा। शहद का बाजार मूल्य वर्तमान में 90 से 100 रुपये प्रति किलोग्राम है। संवाद