पहले आलू और गेहूं की फसल खराब हुई। अब एक महीने से बारिश न होने से धान की फसल भी चौपट होने से किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। रही सही आस गन्ने से बची थी लेकिन चीनी मिलें बकाया भुगतान न कर किसानों के जले पर नमक छिड़क रही हैं। हैदरगढ़ और रौजागांव की चीनी मिले किसानों का करीब सात करोड़ रुपये दबाए बैठी हैं। पिछले छह महीने से भुगतान का झूठा वादा किया जा रहा है।
प्रशासन भी इस मामले में नरमी बरत रहा है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी चीनी मिलें भुगतान नहीं कर रही हैं। जिले का अन्नदाता दैवीय आपदा से ऊबर नहीं पा रहा है। गेहूं की फसल बेमौसम बारिश और ओला वृष्टि की भेंट चढ़ गई। खड़ी फसल के खेत में बर्बाद हो जाने से किसानों को इतना तगड़ा झटका लगा कि उन्होंने आत्महत्या करनी शुरू कर दी।
धान की फसल से किसानों को खासी उम्मीद थी लेकिन एक महीने से बारिश न होने के कारण खड़ी फसल खेतों में बर्बाद हो रही है। रही सही उम्मीद गन्ने से थी। किसानों ने मिलों को गन्ना भी दिया लेकिन जब पैसा देने का समय आया तो मिलों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। गन्ना विभाग के अनुसार रौजागांव चीनी मिल पर जिले के किसानों का करीब 1 करोड़ 93 लाख रुपये बाकी है।
इसी प्रकार हैदरगढ़ चीनी मिल पर जिले के किसानों का करीब 5 करोड़ 41 लाख रुपये बाकी है। लेकिन दोनों चीनी मिलें भुगतान में आनाकानी कर रही है। किसानों ने कई बार अपनी इस समस्या से जिला प्रशासन को अवगत भी कराया लेकिन उसकी इस समस्या का निराकरण नहीं हो पा रहा है। जिससे वे आर्थिक तंगी से जूझ रहा हैं। पैसे के अभाव में किसान आलू की बोआई की तैयारी नहीं कर पा रहे हैं। धान की फसल से किसानों को अब कोई उम्मीद नहीं है। अब किसानों को आलू ही भविष्य का सहारा दिख रहा है।
दरियाबाद और बुढ़वल को छोड़ दिया जाए तो पूरे जिले का गन्ना हैदरगढ़ चीनी मिल को जाता है। बुढवल और दरियाबाद का गन्ना रौजागांव को भेजा जाता है। रौजागांव चीनी मिल फैजाबाद जिले के अंतर्गत आती है। लेकिन इस क्षेत्र के किसानों को इस चीनी मिल को गन्ना देना मजबूरी बना है। बुढवल में लगी चीनी मिल अरसा पहले बंद हो चुकी है।
चीनी मिलों के भुगतान न करने से परेशान किसानों को सहारा जूस वाले देते हैं। गन्ने का जूस बेचने वाले गन्ना किसानों का सहारे बनने लगे हैं। जिले में काफी मात्रा में गन्ने का जूस बेचने वाली दुकानें लगने लगी है। गर्मियों में गन्ने का जूस लोगों को खूब भाता है। जूस वाले किसानों से गन्ना कम रेट पर खरीदते हैं। लेकिन भुगतान नकद करते हैं। इसलिए भी जिन किसानों को तुरंत पैसे की आवश्यकता होती है वे जूस वालों की तरफ रुख करते हैं।