बाराबंकी। अंग्रेजी शासन से देश को आजादी दिलाने के लिए क्रांतिकारियों ने पहली लड़ाई 10 मई, 1857 को मेरठ से शुरू की थी। लेकिन पहले स्वतंत्रता संग्राम की आखिरी लड़ाई बाराबंकी में लड़ी गई। इसका उल्लेख अंग्रेजों से लेकर इतिहासकारों ने भी अपनी किताबों में किया। आपको जानकर हैरत होगी कि इस आखिरी लड़ाई की प्रेरणा से जिले के लोगों ने आजादी की पूरी जंग लड़ी।
बलभद्र सिंह चहलारी बहराइच जिले के मात्र 18 वर्षीय जमीदार थे। उनके पास 33 गांवों की जमीदारी थी। सन 1857 में जब मेरठ में लड़ाई शुरु हुई व अवध के नवाब वाजिद अली शाह की गिरफ्तारी हुई तो उनकी बेगम हजरत महल ने लखनऊ छोड़कर राजा हरदत्त सिंह (बौड़ी) के गढ़ को केंद्र बनाया। यहां देशभक्त व विश्वासपात्र राजाओं, जमीदारों व सेनानियों की बैठक हुई। उसी दिन बलभद्र सिंह चहलारी के छोटे भाई छत्रपाल सिंह का विवाह था।
बताते हैं कि बेगम ने बलभद्र सिंह चहलारी के पास संदेशवाहक भेजा तो वह बरात छोड़कर बौड़ी आ गए। तब सभी राजा अपनी सेनाओं के साथ महादेवा में एकत्र होने लगे थे। बलभद्र सिंह सेना के साथ महादेवा पहुंचे। यहां बेगम ने बलभद्र सिंह को नवाबगंज (अब बाराबंकी) के मोर्चे का नायक बनाकर शाही चिह्नों के साथ ‘राजा’ की उपाधि व 100 गांवों की जागीर सौंप दी।
16,000 सैनिकों के साथ मई 1858 में वर्तमान बाराबंकी शहर के पास स्थित ओबरी में राजा बलभद्र सिंह चहलारी की सेना ने अंग्रेज सेनापति ब्रिगेडियर होप ग्रांट की आधुनिक बंदूकों व तोपाखानों वाली सेना से युद्ध प्रारंभ किया। 13 जून को भीषण युद्ध हुआ। अंग्रेजों के पांव उखड़ गए, मगर अचानक अंग्रेज सैनिकों की नई टुकड़ियों के साथ आ गए। दिसंबर में अंग्रेजी सेना ने तोपों से गोलों की झड़ी लगा दी और करीब 1000 सैनिकों के साथ राजा बलभद्र सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए।
गिरफ्तार किए गए स्वतंत्रता सेनानी, डाकघर लूटा
आजादी की लड़ाई में बाराबंकी जिला हमेशा अग्रण्री रहा। सन 1921 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो बाराबंकी में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का जमकर विरोध किया गया। आज के जीआईसी व तब के सरकारी हाईस्कूल, नवाबगंज पर रफी अहमद किदवई के साथ बड़ी संख्या में स्वतंत्रता सेनानी गिरफ्तारी किए गए। जिला प्रशासन की बेवसाइट barabanki.nic.in के अऩुसार सन 1922 में खिलाफत आंदोलन, 1930 मेें नमक आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बाराबंकी की अग्रणी भूमिका के कारण जिला कांग्रेस कार्यालय को सील कर दिया गया। लेकिन 24 अगस्त 1942 को हैदरगढ़ डाकघर का लूट लिया।