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सपा की गुटबाजी के चलते भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त

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बाराबंकी। जिले की सबसे बड़ी पंचायत के मुखिया के चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे मुकाबले की तस्वीर भी बदलती जा रही है। भाजपा ने पहली बार जिला पंचायत की कुर्सी पर कब्जा जमाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
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सरकार और संगठन की मेहनत के साथ ही मुख्य विपक्षी दल सपा में गुटबाजी के चलते मनोवैज्ञानिक बढ़त भी भाजपा को मिल रही है। जिस तरह से निर्दलीय सदस्य भाजपा के साथ खड़े दिख रहे हैं, उससे हर बीतते दिन के साथ उनकी जीत की संभावनाएं प्रबल होती जा रही हैं। नामांकन में तीन दिन बाकी हैं और अभी तक किसी भी दल ने अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए 26 जून को नामांकन और तीन जुलाई को मतदान व उसी दिन मतगणना होनी है। 57 सदस्यों में से ही चुनाव होना है। सपा और भाजपा के अलावा तीस निर्दलीय और बागी होकर डीडीसी बनने वाले किस करवट बैठेंगे, इस पर पूरा दारोमदार आंका जा रहा था।
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निर्दलीय चुनी गई नेहा आनंद ने निर्दलीय सदस्यों की उम्मीदवार बनकर कुर्सी हथियाने की जोड़-तोड़ शुरू की थी, किंतु कुछ दिन बाद ही ये अचानक सपा में शामिल हो गई। इन दिनों सदस्यों से इनका संपर्क चल रहा है। यह तब है जब पार्टी के सबसे वरिष्ठ रामसागर रावत का नाम भी आया, पर अभी तक किसी की अधिकृत घोषणा पार्टी नहीं कर सकी है।
जिले के कई पूर्व मंत्री और विधायक अपनी-अपनी खेमेबंदी में नजर आ रहे हैं। पार्टी के भीतर नेताओं में छिड़ी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। उधर, सत्ता की हनक के साथ लगातार जिला पंचायत सदस्यों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। सूत्रों के मुताबिक जीत के लिए वोटरों की पर्याप्त संख्या बल भी जुटा लिया है और दल की प्रबल दावेदार पूर्व एमएलए राजरानी रावत अपना प्रचार कर रहीं हैं।
दबी जुबान पार्टी के नेता इन्हें उम्मीदवार भी बता रहे हैं। उठापटक के बीच सपा के खेमे में गिने जाने वाले कई डीडीसी खुलेआम भाजपा की तरफ खड़े दिखाई पड़ रहे हैं। एक मुस्लिम डीडीसी मोहम्मद इस्माइल ने तो बाकायदा भाजपा की सदस्यता तक ग्रहण कर ली है। इससे भी भाजपाईयों को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल रही है। (संवाद)
पहली बार जिला पंचायत पर काबिज हो सकती है भाजपा
जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर नजर डालें तो लंबे समय तक कांग्रेस, उसके बाद सपा और दो बार बसपा का कब्जा रहा है। भाजपा अभी तक जिला पंचायत अध्यक्ष का पद जीत नहीं सकी थी। कई चुनावों में तो वह मैदान से भी बाहर रही। इस बार जिस तरह रणनीति और सर्मथन दिखता है, उससे पहली बार जिला पंचायत पद पर भी कब्जा कर सकती है।
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