बाराबंकी। सतनाम संप्रदाय के प्रथम प्रवर्तक और ईश्वर के रूप माने जाने वाले समर्थ स्वागमी जगजीवन साहेब की पावन तपोभूमि कोटवाधाम में मनाई जाने वाली होली का एक विशेष और अनूठा महत्व है। यहां पूरब फाटक पर जलाई जाने वाली होली को तापने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। ऐसी मान्यता है कि इस होली की आंच के स्पर्श मात्र से क्षय रोग, कुष्ठ, दमा और अन्य कई गंभीर बीमारियों से राहत मिलती है। इसी विश्वास के चलते, होली के दिन से ही यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है। कोटवाधाम की होली केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि एक गहन धार्मिक अनुष्ठान का रूप लेती है। बुजुर्गों की मानें तो यह होली सदियों से मनाई जा रही है, जो बाबा के समय से चली आ रही है। होली का दहन होते ही, रंग-गुलाल के साथ उल्लास का माहौल छा जाता है। दिनभर ढोलक की थाप पर पारंपरिक 'धामड़ गीत' गाए जाते हैं, जो वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। बाबा की समाधि स्थल पर भी दिनभर उत्सव का माहौल बना रहता है, जहां श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। विशेष होली में न केवल स्थानीय लोग, बल्कि गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, लखनऊ, अमेठी, सुल्तानपुर और अयोध्या जैसे आसपास के जिलों से भी भारी संख्या में लोग शामिल होते हैं। बड़ी गद्दी के महंत नीलेंद्र बख्श दास ने बताया कि बाबा के द्वार पर जलाई जाने वाली यह होली अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसके कारण यहां श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक रहती है। यह उनके विश्वास को दर्शाता है कि इस पवित्र अग्नि में उनकी पीड़ाओं का भी अंत हो सकता है।