बाराबंकी। जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर न होने से गरीब मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगे दामों पर इलाज कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल में डॉ. संजीव वर्मा की सेवानिवृत्ति के बाद से यहां कोई हृदय रोग विशेषज्ञ तैनात नहीं है। मरीजों को आपात स्थिति में लखनऊ जाना पड़ता है या निजी डॉक्टरों की शरण लेनी पड़ती है। वहीं रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एसके सिंह की सेवानिवृत्ति के चार साल बाद भी यह पद रिक्त है। फिलहाल काम प्रशिक्षुओं के भरोसे है। जिस दिन वे उपलब्ध नहीं होते, मरीजों को बाहर से निजी जांच करानी पड़ती है। डॉ. आजम हनफी के तबादले के बाद पिछले दो साल से यहां कोई ईएनटी डॉक्टर नहीं है, जिससे संबंधित मरीजों को असुविधा हो रही है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जेपी मौर्य ने बताया कि डॉक्टरों की कमी से व्यवस्था प्रभावित है। रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए समय-समय पर शासन को पत्र भेजा जाता है।
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सीएचसी पर भी है डॉक्टरों की कमी
जिला अस्पताल के साथ-साथ जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को बेहतर इलाज नहीं मिल पा रहा है। देवा, हैदरगढ़, रामसनेहीघाट और रामनगर के स्वास्थ्य केंद्रों पर अल्ट्रासाउंड मशीनें तो हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट न होने के कारण मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। इन केंद्रों पर बाल रोग विशेषज्ञ, सर्जन और हड्डी रोग डॉक्टरों के पद रिक्त हैं। इस वजह से मामूली सर्जरी या हड्डी से जुड़ी समस्याओं के लिए भी मरीजों को निजी अस्पतालों या शहर की दौड़ लगानी पड़ती है। सरकारी केंद्रों पर निशुल्क सुविधा न मिलने के कारण गरीब मरीजों को बाहर से महंगा इलाज कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।