हैदरगढ़। सब्जियों के अवशेष से बनने वाली जैविक खाद पर प्रयोग सफल रहा तो खेती में लाभ बढ़ने के साथ पर्यावरण सुरक्षा में भी सहायक बनेगा। फसल व सब्जियों के अवशेष व गाय के गोबर से चंदौली में तैयार खाद का जिले में केवीके सहित दस किसानों के खेत में परीक्षण किया जा रहा है।
आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र के फार्म पर गेहूं के एक खेत में नवीन प्रयोग किया जा रहा है। वरिष्ठ वैज्ञानिक व केंद्र अध्यक्ष डॉ अश्विनी सिंह ने बताया अभी तक प्राकृतिक खेती के लिए प्रचलन में रही वर्मी कंपोस्ट खाद को तैयार करने पर अधिक समय लगता है। एफओएम खाद (किण्वित जैविक खाद) जिला चंदौली में पराली, सब्जियों के अवशेष व गाय के गोबर से बनाई गई, जो उर्वरकों की तरह बोरियों में पैक कर किसानों मिलेगी और इसकी लागत रासायनिक खाद से काफी कम होगी। फार्म पर एक प्लाट को तीन हिस्सों में बांट कर प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें गेहूं की फसल के एक भाग में सौ प्रतिशत एफओएम खाद, दूसरे भाग में 25 प्रतिशत रासायनिक खाद के साथ एफओएम का प्रयोग और तीसरे भाग में सौ प्रतिशत रासायनिक खाद से फसल तैयार की जा रही है। वरिष्ठ वैज्ञानिक सभी खंडों में फसल के ग्रोथ की निगरानी कर रहे है और उत्पादन का आंकलन कर रिपोर्ट दी जाएगी। प्रयोग सफल होने पर पराली प्रबंधन की समस्या समाप्त होने के साथ खर्च में कमी से किसानों की आय बढ़ाने में भी एफओएम सहायक होगी।