राजधानी के ट्रॉमा सेंटर में आग लगने के बाद भी अस्पताल प्रशासन सतर्क नहीं हुआ। पुरुष व महिला अस्पताल में ओपीडी से लेकर भर्ती वार्ड तक आग से बचाव के इंतजाम पर्याप्त नहीं है। जो फायर फॉक्स सिलेंडर लगे भी हैं, उनमें कई के मीटर खराब हैं।
अधिकांश की सील तक नहीं खुली है। अस्पतालों में न तो अंडरग्राउंड वाटर टैंक हैं और न ही आपात द्वार। आग लगने पर काबू पाना अस्पताल प्रशासन के लिए चुनौती साबित हो सकता है। जिला अस्पताल, सीएचसी और पीएचसी में आग पर काबू पाने के इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं। उपकरण के नाम पर महिला अस्पताल के पूरे परिसर में 25 फायर एक्सटिंग्यूशर हैं।
ब्लॅड बैंक में एक, ओपीडी में दो, नई बिल्डिंग में तीन सिलेंडर धूल फांक रहे हैं। आग लगने पर इसका इस्तेमाल करने के लिए न तो अलग से स्टाफ है और न ही किसी को प्रशिक्षण दिया गया है। आपात काल में अलर्ट करने के लिए फायॅर आलर्म तक नहीं लगा है।
जिला अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसके शुक्ला का कहना है कि ओपीडी से लेकर वार्ड तक के जो पुराने भवन हैं उनमें आग बुझाने के लिए छोटे सिलेंडर की व्यवस्था है जो पर्याप्त हैं। ओवरहेड के तौर पर बनी पानी टंकी से मदद मिल सकती है। अब जो नए भवन जैसे ट्रॉमा सेंटर व मैटरनिटी वार्ड का निर्माण हुआ है, उसमें आग बुझाने के हाईटेक इंतजाम हैं।
उधर महिला अस्पताल के प्रभारी सीएचसी डॉ. किशोर ने बताया कि चार माह पूर्व फायर ब्रिगेड के अधिकारियों ने स्वास्थ्य कर्मचारियों को आग से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया था।
जिला अस्पताल की पुराने इमरजेंसी वार्ड के पास पावर कंट्रोल रूम बना है। यहां पर तारों का जाल है। बाक्स के अंदर आपस में जुड़े तारों को ब्लैक इलेक्ट्रिक टेप के बजाए पन्नी से बांधा गया है। जो कभी की एक दूसरे को टच कर शार्ट सर्किट से हादसे का कारण बन सकते हैं। जर्जर तारों को बदले बिना विद्युत आपूर्ति की जा रही है।