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नहाय खाय रस्म के साथ शुरू हुआ छठ महापर्व

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बाराबंकी। पूर्वांचल के महापर्व डाला छठ की नहाय खाय रस्म के साथ शुरुआत हो गई। महिलाओं ने शाम को स्नान व पूजन के बाद सादा भोजन ग्रहण किया। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर कार्तिक सप्तमी तक मनाए जाने वाले डाला छठ पर्व से व्रत रखने वाले घरों में उत्सव सरीखा माहौल है। घरों में शाम को छठ मइया के पारंपरिक गीत गूंजने लगे हैं।
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बुधवार महिलाओं ने परंपरा के अनुसार नहाने के बाद पूजा-अर्चना की और लौकी की सब्जी व चने की दाल बनाकर उसका भोग लगाया और प्रसाद ग्रहण किया। शाम को घरों में महिलाओं ने छठ मइया के पारंपरिक गीत गाए। गीतों के माध्यम से छठ मइया की महिमा का बखान किया।
दर्शन देहु अपार हे छठी मैया, सुन ले अरजिया हमार हे छठी मइया..., केरवा जे फरेला घवद से ओह पे सुगवा मंडराय.., रात छठिया मइया गवनै अइली.. आदि पारंपरिक गीत गाए।
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बुधवार दोपहर बाजार पहुंचीं महिलाओं ने पूजा-अर्चना के लिए कच्ची हल्दी, कच्ची अदरख, कच्ची गाजर, शकरकंद, आंवला, कैथा, कमरान, पनियाला, अनन्नास, गागरा, सुथनी, गन्ना, सिंघाड़ा, शरीफा, केला, सेव, संतरा व कच्ची सुपारी आदि की खरीदारी की।
कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना अनुष्ठान के रूप में जाना जाता है। इसे छोटी छठ भी कहते हैं। इस दिन व्रत करने वाले लोग दिनभर उपवास रखते हैं। शाम को गन्ने के रस या गुड़ से बने हुए चावल की खीर (बखीर), चावल का पिट्ठा और रोटी बनाई जाती है। पूजन उपरांत इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता है। गुरुवार को खरना अनुष्ठान के साथ ही महिलाएं निर्जला व्रत रहेंगी।
छठ व्रत के बारे में कहा जाता है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजा जाता है। इसे रखने वाली महिला जब व्रत उठाती हैं तो पांच साल तक रखना अनिवार्य होता है। उसके बाद वह चाहे तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को सौंप सकती हैं। सास यह व्रत बहू को ही सौंपती है, ऐसा नहीं। परिवार का सक्षम सदस्य चाहे वह जेठानी हो या देवरानी, उसे भी सौंपा जा सकता है। छठ का व्रत उठाने वाली महिलाएं श्रद्धा के साथ निरंतर व्रत रख पूजा-अर्चना कर रही हैं।
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