बाराबंकी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जिस समय देश को आजाद कराने की लड़ाई लड़ रहे थे, ठीक उसी समय धर्म के नाम पर मुल्क को दो टुकड़ों में बांट दिया गया। 14 अगस्त 1947 की आधी रात हुए विभाजन में लाखों लोग बेघर हो गए। विभाजन से पहले और बाद में पाकिस्तान से बड़ी तादाद में सिंधी और पंजाबी परिवार छत की आस में अलग-अलग प्रांत और शहरों में पहुंचे।
लाहौर, सिंध, पंजाब समेत अन्य प्रांतों से 1945 से 1947 तक करीब डेढ़ दर्जन पंजाबी, सिख व 10 सिंधी परिवार यहां पहुंचे। सरकार ने इन्हें लखनऊ-अयोध्या हाईवे के किनारे लाजपत नगर मोहल्ले में किराए की छत देकर बसाया, जिन्हें तब रिफ्यूजी कॉलोनी के रूप में जाना जाता था। विभाजन की विभीषिका झेलने के बाद खाली हाथ आए इन परिवारों ने हार नहीं मानी और स्वयं के साथ परिवार को स्थापित किया।
आज अर्थव्यवस्था और समाज की तरक्की में बढ़-चढ़कर योगदान कर रहे हैं। पाकिस्तान से आए ज्यादातर लोग काल के गाल में समा चुके हैं, लेकिन अपने पूर्वजों से सुनी विभीषिका की कहानी आज भी परिवार के सदस्यों के जहन में कौंध रही है। कहते हैं कि विभाजन की विभीषिका के दंश से उबरना आसान नहीं था।
एक साल पहले से शुरू हो गई थी हिंसा
सरदार भूपेंद्र सिंह बताते हैं कि उनके दादा स्व. सरदार मेहर सिंह 1946 के आसपास दंगे शुरू हुए तो पत्नी भागवंती कौर, पुत्र हरभजन, सुरतीत, गुरवंत व हरवंत सिंह के साथ पाकिस्तान छोड़कर आ गए थे। लखनऊ सीमा पर बसे बरेठी गांव में आकर रुके और यहां खेतिहर मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण शुरू किया। 1947 के बाद बाराबंकी में आकर बसे और खेती के साथ व्यापार शुरू किया। पाकिस्तान में हिंसा का आलम यह था कि सरदार मेहर सिंह को अपनी जमीन व घर बेचने का भी मौका नहीं मिला था।
विभाजन ने दिए कभी न भरने वाले जख्म
लक्ष्मण वादवानी लच्छू बताते हैं कि उनके दादा स्व. सेवाराम परिवार के छह सदस्यों एवं आठ से 10 सिंधी परिवारों के साथ पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद से बाराबंकी पहुंचे थे। पिता स्व. मोहनलाल वादवानी उस समय सिर्फ आठ वर्ष के थे, जिन्होंने विभाजन के समय हुई हिंसा की पूरी कहानी अपने बच्चों को भी बताई। लक्ष्मण के मुताबिक विभाजन की
विभीषिका का दंश इतना दर्दनाक था कि वर्षों तक वो मंजर याद करते ही फिर से दर्द से कांप उठते थे। विभाजन ने कभी न भरने वाले जख्म दिए हैं।