बाराबंकी। स्थानीय जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल पीजी कॉलेज में शनिवार को ''नार्वे में हिंदी की स्थिति'' विषय पर संगोष्ठी हुई।
नार्वे से पधारे अंतरराष्ट्रीय वक्ता डॉ. सुरेशचंद्र शुक्ल ''शरद आलोक'' ने नार्वे के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा करते हुए बताया कि नार्वे में इसे मातृभाषा का दर्जा हासिल है। इसके अतिरिक्त, उर्दू, पंजाबी, तमिल और संस्कृत जैसी भाषाओं को भी पढ़ने-पढ़ाने का अवसर उपलब्ध है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नार्वे में महिलाओं को भाषा सीखने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया जाता है। भारतीय मूल के लोग आपस में हिंदी में संवाद करना पसंद करते हैं। आज हिंदी व्यापार और संस्कार दोनों की भाषा बन गई है, जिसका प्रभाव विश्वव्यापी है। भारतीय सिनेमा के बढ़ते प्रभाव ने भी हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित किया है। वर्तमान में हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
चीन गणराज्य में अपनी सेवाएं दे चुके डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ने बताया कि चीन में मंदारिन के साथ-साथ हिंदी भाषा का भी काफी महत्व है। वर्तमान में चीन के लगभग 20 विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन कराया जा रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर डॉ. सीताराम सिंह ने की। प्रो. अनिल कुमार विश्वकर्मा, प्रो. अम्बरीश कुमार शास्त्री, प्रो. रीना सिंह, प्रो. अमित कुमार आदि मौजूद रहे।