बाराबंकी। पिछले वर्ष देवा स्थित हाजी वारिश अली साह की मजार पर होली खेलते सभी धर्मों के लोग। फाइल ?
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देवा (बाराबंकी)। सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली में जमकर रंग खेला जाता है। रंग खेलने के लिए देश के विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालु सूफी संत की मजार पर होने वाले इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की पवित्र सरजमीं देवा शरीफ में होली के रंग निराले हैं। यहां पर होली के दिन हर धर्म से जुड़े लोग एक-दूसरे को रंग लगा कर गले मिलते हैं। इस आयोजन की शुरुआत करीब 50 वर्ष पूर्व वारसी होली समिति ने की थी। इसी समिति के बैनर तले हर साल सुबह 8 बजे कौमी एकता द्वार पर फूलों की होली के साथ देवा की होली की शुरुआत होती है। गाजे-बाजे के साथ होली का जुलूस कोतवाली परिसर पहुंचता है। जहां पुलिसकर्मियों के साथ रंग खेलने की परंपरा है।
इसके पश्चात जुलूस मोहल्ला कचेहरान से होता हुआ 12 बजे सूफी संत की मजार परिसर में प्रवेश करता है। यहां पर मजार ट्रस्ट के लोग जुलूस का इस्तकबाल करते हैं। इसके बाद यहां शुरू होती है सूफी संत की नगरी की अद्भुत होली, जो पूरे अवध की शान कही जाती है। रंग-बिरंगे गुलाल और फूलों की पंखुड़ियों से मजार परिसर में खेले जाने वाली होली में दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, गुजरात, राजस्थान सहित कई प्रांतों के श्रद्धालु यहां बाबा की नगरी की होली को देखने व खेलने के लिए बड़ी संख्या में जुटते हैं।
वर्षों से देवा की होली पूरे अवध में अपनी अमिट छाप छोड़ती रही है। कौमी एकता और आपसी सद्भावना व प्यार का ऐसा नजारा देश भर में कहीं और नहीं दिखाई देता। कौमी एकता द्वार से शुरू होने वाली होली का जुलूस मजार शरीफ पर रंग खेलने के बाद देवा की होली का समापन होता है। इसके बाद लोग अपने अपने घरों की ओर रवाना होते हैं। इस बार भी कोविड-19 संक्रमण के प्रभाव के बावजूद देवा की होली को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह नजर आ रहा है। तो वहीं होली के जुलूस का आयोजन करने वाली वारसी होली समिति के पदाधिकारी जुलूस की भव्यता बढ़ाने के लिए दिन-रात एक करने में जुटे हैं।