बाराबंकी। आज जब सरकार बच्चों की कमी के कारण स्कूलों को पेयरिंग नीति के तहत बंद कर छात्र-छात्राओं को पास के दूसरे में स्कूलों में भेज रही हैं, वहीं लोग ‘जबरिया तालीम’ को याद कर रहे हैं, जिसने जिले के 250 गांवों में शिक्षा की जड़ें इतनी गहरी कीं कि पीढ़ियां रोशन हो उठीं। जी हां, आजादी के बाद भी बाराबंकी के सूर्यपुर परगना में ‘जबरिया तालीम’ नाम से एक अनोखा अभियान चला। गांव-गांव में स्कूल खोले गए और जो अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे, उन पर जुर्माना लगाया जाने लगा। नतीजा यह हुआ कि हजारों लोग शिक्षित होकर सरकारी नौकरियों तक पहुंचे।
सिद्धौर ब्लॉक के शेषपुर जाहिदली गांव निवासी 82 वर्षीय सत्यनाम मिश्र जो खुद भी सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक रह चुके हैं, बताते हैं कि 1960 के आसपास हथौंधा के राजा ने अपने सूर्यपुर परगना के गांवों में जबरिया तालीम लागू की। उस समय स्कूल कम थे, लेकिन राजा का आदेश था कि हर बच्चे को पढ़ाया जाए। जो बच्चे स्कूल नहीं जाते, उनके मां-बाप पर जुर्माना लगाया जाता था। इसी सख्ती के कारण हम जैसे तमाम लोग शिक्षित होकर शिक्षक बन पाए।
असंद्रा के शिक्षक चंद्रमौलि तिवारी कहते हैं कि नाम सुनने में कठोर लगता है, लेकिन जबरिया तालीम समाज को शिक्षा से जोड़ने का एक मजबूत और जरूरी फैसला था। आज भी गांवों में बुजुर्ग इसे याद करते हैं। 1067 तक यह अभियान चला। (संवाद)
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राजमहल में आज भी चल रहा स्कूल
रामसनेहीघाट तहसील क्षेत्र के जरौली गांव निवासी साहित्यकार योगेंद्र मधुप बताते हैं कि राजा की यही सकारात्मक सोच रही कि उनके राजमहल में आज भी स्कूल संचालित होता है। मेरे पिता राजनाथ शुक्ला को भी इसी जबरिया तालीम के तहत स्कूल भेजा गया था। आगे चलकर वे दूरसंचार विभाग में लाइन इंस्पेक्टर बने।
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नरोत्तम द्विवेदी जाते थे गांव-गांव
नसीपुर गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक सिद्धार्थ प्रकाश शर्मा बताते हैं कि असंद्रा के मिर्चिया गांव निवासी नरोत्तम द्विवेदी को गांव-गांव में जबरिया तालीम लागू करने के लिए भेजा जाता था। उनका पद गिहदावल कहलाता था। कई अभिभावकों को जुर्माना भी भरना पड़ा। आज क्षेत्र का विकास उसी नीति की देन है।