बाढ़ के दौरान परसावल के लोगों की जिंदगी पांच माह तक खुले आसमान के नीचे बंधे पर गुजरती है। हाड़-पसीने से तैयार की जाने वाली फसल और गृहस्थी को बाढ़ की विभीषिका पलक झपकते ही अपने साथ बहा ले जाती है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, बाढ़ पीड़ितों को 6 सौ क्लस्टर आवास बनाकर कमियार गांव के निकट बसाया जाएगा। इसके लिए पूरी तैयारी कर ली गई हैं।
घाघरा नदी में हर साल आने वाली बाढ़ तराई के सैकड़ों गांवों के लोगों का जीवन तहस नहस कर देती है। लेकिन सबसे अधिक दिक्कतें परसवाल गांव के लोगों को होती है। गांव की आबादी 42 सौ के आसपास है और यहां पर करीब एक हजार परिवार रहते हैं। नदी के तेवर बदलते ही सबसे पहले कहर इसी गांव पर गिरता है। बाढ़ गांव और फसलों को अपने साथ बहा ले जाती है। बाढ़ खत्म होतेे ही यहां के लोग फिर से नए जीवन की शुरूआत करते हैं और नए तरीके से अपना अशियाना बनाते हैं। कई वर्षों से यही होता चला आ रहा है।
तत्कालीन जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा ने बाढ़ पीड़ितों की इस समस्या को काफी गंभीरता से लिया और निरीक्षण के दौरान प्रमुख सचिव राजस्व सुरेश चन्द्र के सामने यह बात रखी थी। जिसके बाद पूरे गांव को दूसरे जगह बसाने पर सहमति हुई थी।