जर्मनी में कास्य पदक जीतने के बाद तिरंगा लहराते बलवीर सिंह।
बाराबंकी। अगर जज्बा हो तो बीमारी या कठिनाई इंसान को रोक नहीं सकती। बाराबंकी के बलबीर सिंह इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। गुर्दे का प्रत्यारोपण होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने हौसले के दम पर जर्मनी में हुए वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर बैडमिंटन प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।
यह उनकी पांचवीं अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि है। वह देश का प्रतिनिधित्व करते हुए बैडमिंटन में दो बार स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं। जर्मनी से लौटने के बाद बलवीर रविवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचे और अनुभव साझा किए।
बलवीर जिले के बंकी ब्लॉक में लिपिक पद पर तैनात है। बचपन से ही उन्हें बैडमिंटन खेलने का जुनून था। वर्ष 2003 में इनको ग्राम्य विकास विभाग में लिपिक संवर्ग में नौकरी मिल गई। इसके बाद भी वे बैडमिंटन खेलते रहे। 2009 में उन्हें परेशानी हुई तो चिकित्सकों ने जांच कराई। इसमें पता चला कि उनकी दोनों गुर्दे खराब हो चुके हैं। जान बचाने के लिए 45 बार उनकी डायलिसिस हुई। जीवन काफी दुरूह लगने लगा, पर हिम्मत नहीं हारी।
2011 में किसी अज्ञात व्यक्ति के अंगदान से उनके गुर्दे का प्रत्यारोपण किया गया। बलवीर ने बताया कि इसके बाद उन्होंने वादा किया कि अब इस जिंदगी को रुकने नहीं दूंगा। खेल ही मेरी सांसों की ताकत बनेगा। उन्होंने बताया कि जब उनकी किडनी ट्रांसप्लांट का समय आया तो उनके भाई जगवीर सिंह ने कर्ज लेकर उनकी मदद की और हमेशा साथ देते रहे। इस कठिन सफर में उनकी पत्नी ममता सिंह और परिवार ने बड़ी ताकत दी। डायलिसिस के बाद मैं टूट जाता था लेकिन मेरी पत्नी व परिवार ने कभी मेरा हौसला गिरने नहीं दिया।