बाराबंकी। रंगों का त्योहार होली, जहां देशभर में उल्लास और उमंग का संचार करता है, वहीं स्थानीय रामनगर में यह पर्व एक अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा का गवाह बनता है। लगभग 200 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल राजघराने से जुड़ी है, बल्कि इसने अमीर-गरीब के भेद को मिटाकर सभी को एक साथ रंग खेलने का अवसर भी प्रदान किया है। रामनगर की होली, सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है।
यह अनोखी परंपरा रामनगर स्टेट के राजा अमर कृष्ण नारायण सिंह द्वारा लगभग दो शताब्दी पूर्व शुरू की गई थी। उस समय क्षेत्र में व्याप्त गरीबी के कारण कई लोग नए वस्त्र खरीदने में असमर्थ थे। इस असमानता को दूर करने और सभी को समान अवसर देने के उद्देश्य से, राजा ने पूरे दिन रंग खेलने की प्रथा का आरंभ किया। यह परंपरा तब से राजघराने का अभिन्न अंग बनी हुई है। राजा अमर कृष्ण नारायण सिंह के निधन के बाद, उनके पुत्र कुंवर रत्नाकर सिंह ने इस विरासत को संभाला और अब उनकी पत्नी, रानी मृणालिनी सिंह, इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
रामनगर में होली का उत्सव सुबह फगुवा गीतों के साथ प्रारंभ होता है। घमेड़ी, लखरौरा, रानी मोहल्ला, कादिराबाद जैसे विभिन्न मोहल्लों से होरियारों की टोलियां पारंपरिक गीतों, जैसे ‘कान्हा राधा करें बर जोरी, होली आई रे कन्हाई…’, पर थिरकते हुए दरवाजे-दरवाजे जाकर रंग-गुलाल लगाती हैं। यह सिलसिला शाम तक चलता है, जिसका समापन राजघराने की कोठी पर होता है। शाम ढलने के बाद, लोग नए वस्त्र धारण कर एक-दूसरे के घर जाकर होली की बधाई देते हैं।
फाल्गुन की पंचमी से ही फाग गीतों की शुरुआत हो जाती है, जो हर शाम नागरिकों के घरों में गूंजते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत करते हैं। रामनगर की होली में गंगा-जमुनी तहजीब की झलक भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ मिलकर होली खेलते हैं। कई मुस्लिम भाई फाग की टोलियों का स्वागत माला पहनाकर और गले मिलकर करते हैं।
धार्मिक आस्था का संगम
होली के दिन, नगरवासी सबसे पहले श्री लोधेश्वर महादेवा मंदिर में भगवान भोलेनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित कर अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त करते हैं। इसके उपरांत, वे अपने घरों में लौटकर रंगों का यह पर्व मनाते हैं।