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धनतेरस आज, बाजार तैयार

Sun, 08 Nov 2015 11:38 PM IST
बाराबंकी/अमर उजाला ब्यूरो
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हमारे समाज में किसी भी पर्व को मनाने के लिए कुछ परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं लेकिन बदलते परिवेश के साथ परंपराओं में बदलाव व आधुनिकता तेजी से हावी हो रही है।
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धनतेरस पर लोग कुबेर व काली जी की पूजा करना भूल जाते हैं लेकिन खरीदारी को खास तवज्जो देते हैं। मिट्टी के दिए भी धीरे-धीरे अस्तित्व खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब चायनीज झालरों का बोल बाला है।

सोमवार को हनुमान जयंती के साथ ही लगातार पांच पर्वों का महा संगम शुरू होने जा रहा है। शहर व ग्रामीण अंचलों में हनुमान मंदिरों को सजाकर पूरी तैयारी कर ली गई है।
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मंगलवार को कुबेर पूजा व काली मां की पूजा आराधना होगी। इसी दिन को शुुुभ मानते हुए लोग सोना, चांदी, वाहन व गृहस्थी की अन्य वस्तुएं खरीदते हैं।

वैदिक काल से चली आ रही परंपराएं आज के आधुनिक दौर की भेंट चढ़ती जा रही हैं। धनतेरस के दूसरे दिन दीपावली का पर्व लोग बढ़ी ही श्रद्धा से मनाते हैं।

इस दिन भगवान श्रीराम जी बुराई पर अच्छाई की विजय पाकर अयोध्या लौटे थे। अपने राजा को अपने पास देख प्रजा ने खुशी में घी के दिए जलाए, तब से यह परंपरा चली आ रही है।

पुराने समय में पांच धन गोधन, गजधन, बाजधन, रतनधन, खानधान में गोधन को सबसे बड़ा धन माना जाता था। इसी वजह से गाय सभी माओं से सर्वश्रेष्ठ मानते हुए इसकी पूूजा अर्चना की जाने लगी।

भगवान श्रीकृष्ण ने गायों को भीषण तूफान से बचाने के लिए जिस पर्वत को उठाया उसका नाम गोवर्धन पर्वत था। तब से गोवर्धन पूजा होने लगी। तब से आज तक चली आ रही परंपरा निभाई जा रही है।

इस दिन ग्रामीण अंचलों में गाय व अन्य जानवरों को नहलाकर उसकी सींग व पूरे शरीर में गेरु लगाया जाता है। उसके ठीक दूसरे दिन भइया दूज जिसे यम दूतिया भी कहा जाता है मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र के लिए व्रत रखकर पूजा करती हैं।
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