मसौली (बाराबंकी)। दिगंबरनाथ मंदिर पर पूजन अर्चन के बाद श्रीमद्भागवत कथा का प्रारंभ हुआ। पहले दिन कथा वाचक रामहेतु ने आत्मदेव धुंधली और धुंधकारी की कथा सुनाई। कहा कि आत्मदेव एक वेद पाठी ब्राह्मण थे, बड़े ही विद्वान थे। लेकिन उनके कोई पुत्र नहीं था। वह ग्लानि से भरे हुए एक दिन जंगल में जा पहुंचे। वहां उन्हें एक साधु के दर्शन हुए। साधु ने उन्हें एक फल दिया। और संतान प्राप्ति के लिए पत्नी को खिलाने के लिए कहा।
वापस आकर ब्राह्मण ने पत्नी से प्रसाद ग्रहण करने को कहा। पत्नी ने फल स्वयं खाने की जगह गऊ माता और बहन को खिला दिया। प्रसाद ग्रहण के बाद उसके गाय ने गोकरण और बहन ने धुंधकारी नामक पुत्रों को जन्म दिया। धुंधकारी दुराचारी, व्यभिचारी निकला। व्यसन में पड़कर चोरी करने लगा। एक दिन लोभ में आकर इसकी हत्या कर दी। बाद में यह प्रेत बना, जिसकी मुक्ति के लिए गोकर्ण महाराज जी ने भागवत कथा का आयोजन किया। भागवत कथा सुनकर धुंधकारी को मोक्ष की प्राप्ति और प्रेत योनि से मुक्ति मिली।