बाराबंकी। मानवाधिकार के नियमों को थाने में रोजाना बूटों तले रौंदा जाता है। जिले में कोई भी ऐसा थाना नहीं है जहां पर प्रतिदिन किसी ने किसी बेगुनाह को पूछताछ के बहाने थाने लाकर प्रताड़ित न किया जाता हो। किसी भी मामले मेें पुलिस नामजद आरोपियों पर दबाव के लिए उनके रिश्तेदारों या परिवारीजनों को पकड़ती है। उसके बाद पुलिसिया खेल शुरू हो जाता है। बेकसूरों को थाने केे स्ट्रांग रूम में बंद कर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया जाता है। विभाग के आला अफसरों की जानकारी के बावजूद पुलिस के इस काम पर अंकुश नहीं लग रहा। कोठी थाने में एक महिला को जिंदा जलाने में भी खाकी की हैवानियत सामने आई है उसमेें भी मृतका पुलिस द्वारा अवैध हिरासत में रखे गए अपने पति को छुड़ाने थाने गई थी। जिले में इससे पहले भी हुई कुछ घटनाओं में पुलिस पर यह कलंक लग चुका है।
पुलिस कस्टडी में जिले में हुई मौतें
केस 1 : जून 2009 मेें जहांगीराबाद थाना क्षेत्र में एक पेट्रोल पंप पर हुई लूट के मामले में वहां के मैनेजर सुशील वर्मा को ही पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ की गई थी जिसके बाद 26 जून को सुशील की पुलिस पिटाई व हिरासत में मौत हो गई। इस मामले में काफी हंगामे व धरना प्रदर्शन के बाद तत्कालीन एएसपी अजय प्रताप, सीओ सिटी धर्मेंद्र सचान व एसओ आनंद सिंह समेत कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी। वहीं
केस 2 : 2011 अगस्त में घुंघटेर थाना क्षेत्र में भिठोखर गांव में हुई एक बच्ची की हत्या के मामले मेें हिरासत में लिए गए सूरमा भोपाली नामक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस मामले में भी कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई थी। पर इन सबके बावजूद दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होने के चलते पुलिस हिरासत में होने वाली मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है।
केस 3 : 23 मार्च 2014 को कोठी थाना क्षेत्र के ठाकुरपुरवा गांव में थाने के सिपाही राम गोपाल यादव की पिटाई से गांव के ही किसान मुन्नू यादव की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद भाकियू कार्यकर्ताओं ने काफी प्रदर्शन किया था जिसके बाद सिपाही को निलंबित कर उसके खिलाफ रिपोर्ट तो दर्ज हुई पर कुछ दिन बाद ही मामला रफा दफा कर दिया गया।
केस 4 : 24 जून 2014 को सतरिख थाने में पुलिस हिरासत में किसान राम सुरेश की मौत हुई थी। जनपद के नेताओं ने जमकर हो हल्ला मचाया था। मगर, पुलिस ने पूरे मामले को दबा दिया था।
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24 घंटे से ज्यादा थाने में नहीं रख सकते
जिला बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अधिवक्ता रमन द्विवेदी बताते है कि पुलिस को कोई अधिकार नहीं है कि वह जिसे चाहे उसे पकड़कर थाने ले आए और उससे पूछताछ करे। इनका कहना है कि ऐसी शिकायत पर संबंधित पुलिस कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए। मानवाधिकार आयोग के नियमों के मुताबिक थाने गए बुलाए को व्यक्ति को बिना प्रताड़ित किए पुलिस उससे कुछ समय तक रोक कर ही पूछताछ कर सकती है। यदि किसी को थाने में 24 घंटे से ज्यादा रखा जा रहा है तो वह नियमत: गलत है।
पुलिस के रवैये से हर कोई खफा
कोठी थाने में एक पत्रकार की मां को जिंदा जलाने की घटना की जितनी निंदा की जाए वह कम है। पुलिस की इस निरंकुशता से यह साफ हो गया है कि प्रदेश सरकार में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये मुआवजा देने के साथ ही दोषी पुलिस कर्मियों की जल्द से जल्द गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए।
दिनेश वैश्य, समाजसेवी
सपा सरकार में महिलाएं असुरक्षित
प्रदेश सरकार में चारों तरफ अराजकता का माहौल है। सरकार के मनमाने रवैये से ही आज पुलिस भी बेअंदाज हो चुकी है और किसी की सुनवाई नहीं हो रही है। जब थाने में महिला को जिंदा जलाया जा रहा है तो भला सपा सरकार में महिलाएं अपने आप को सुरक्षित कैसे समझेंगी। इस सरकार को बर्खास्त करना चाहिए।
- सुधीर कुमार सिंह सिद्धू, भाजपा नेता
अफसर हो गए बे-लगाम
सरकार में पुलिस व प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं बची है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ी बड़ी बातें करने वाली सरकार की पुलिस द्वारा थाना परिसर में महिला को जिंदा जलाया जा रहा है। अफसर बेलगाम हो गए हैं। पुलिस भी किसी की नहीं सुन रही है। थाने पर यदि कोई काम कराना है तो उसका नजराना पेश किए बगैर सुनवाई नहीं होती है।
- नवीन सिंह राठौर, समाज सेवी