भीटी। क्षेत्र के तरसावां में श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन कृष्ण–रुक्मिणी विवाह प्रसंग का वर्णन किया गया। प्रवाचक राही महाराज ने बताया कि आत्मनिर्णय और साहस से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। गुण और चरित्र व्यक्ति की पहचान का आधार होते हैं। सामाजिक दबाव के बीच विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक है। कथा में विदर्भ, मगध और द्वारका से जुड़े प्रसंगों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया गया।कथा के अनुसार रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं। भीष्मक मगध के राजा जरासंध के अधीन शासक थे। रुक्मिणी कृष्ण के गुण, चरित्र और पराक्रम से प्रभावित थीं और उनसे विवाह की इच्छुक थीं। रुक्मिणी के पिता कृष्ण से विवाह के पक्ष में नहीं थे। रुक्मिणी ने संदेशवाहक के माध्यम से कृष्ण को अपनी स्थिति और विवाह की इच्छा से अवगत कराया। संदेश प्राप्त होते ही कृष्ण विदर्भ पहुंचे और सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों के बीच रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह किया। कथा के उपरांत कृष्ण–रुक्मिणी विवाह की आकर्षक झांकी निकाली गई। जिसे देखकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए।