लखनऊ। गोमती के किनारों पर लगातार बढ़ते अतिक्रमण और कंक्रीटीकरण पर उठ रहे गंभीर सवाल के बीच लखनऊ कैंट बोर्ड ने पिपराघाट के पास ऐतिहासिक दिलकुशा कोठी क्षेत्र में नया रिवरफ्रंट विकसित करने की योजना बनाई है। इस पर करीब 200 करोड़ रुपये की लागत आएगी। नदी के किनारों पर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन कॉरिडोर तैयार करने का प्रस्ताव है। उधर, पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि परियोजना गोमती के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र में आगे बढ़ती है तो नदी पर दबाव बढ़ेगा।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हाल ही में गोमती के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में नियमों के विपरीत किसी भी निर्माण पर रोक लगाते हुए संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। राजधानी के पर्यावरण विशेषज्ञ एडवोकेट आलोक सिंह ने चिंता जताई है कि नदी को सुंदर बनाने के नाम पर गोमती के प्राकृतिक स्वरूप, बाढ़ क्षेत्र और भूजल तंत्र को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
सिकुड़ते बाढ़ क्षेत्र से बढ़ रहा खतरा
आलोक सिंह का कहना है कि गोमती के दोनों किनारों पर लगातार कंक्रीट संरचनाएं बनने से नदी का प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र तेजी से सिमट रहा है। भूजल रिचार्ज भी प्रभावित हो रहा है। नदी भूजल से चलती है और इसका तंत्र कमजोर हो रहा है।
लगातार घट रही नदी की जैव विविधता
गोमती पर काम करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता एडवोकेट अनुराग पांडेय का कहना है कि प्राकृतिक नदी में उथले और गहरे जल क्षेत्र, रेतीले तट, दलदली इलाके, वेटलैंड और प्राकृतिक वनस्पतियां मछलियों, पक्षियों और अन्य जीवों का घर होती हैं। रिवरफ्रंट के बाद इन प्राकृतिक आवासों की जगह कंक्रीट के तट बनते जा रहे हैं। गोमती की जैव विविधता लगातार घट रही है। नदी का पारिस्थितिकी तंत्र खत्म हो गया तो इसकी पर्यावरणीय कीमत बहुत भारी होगी।