बाराबंकी। जिले की सड़कें अब मौत का रास्ता बन चुकी हैं। पिछले पांच वर्षों में यहां सड़कों पर वाहनों का दबाव सात गुना तक बढ़ गया है। इसी अवधि में सड़क हादसों में 1,600 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। तेज रफ्तार, लापरवाही और सिस्टम की सुस्ती ने सड़क सुरक्षा को मजाक बना दिया है।
बाराबंकी जिले में कुल लगभग 5,000 किलोमीटर सड़कें हैं। इनमें पांच प्रमुख मार्ग पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, लखनऊ-सुल्तानपुर, लखनऊ-अयोध्या, लखनऊ-बहराइच और बाराबंकी-बहराइच हाईवे शामिल हैं। लेकिन पूर्वांचल एक्सप्रेसवे को छोड़ दें तो बाकी सभी सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ चुका है। सबसे खराब स्थिति बाराबंकी-बहराइच हाईवे की है, जो बिना डिवाइडर के दो लेन का है। इसी मार्ग पर सबसे अधिक हादसे हो रहे हैं। लोक निर्माण विभाग के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में इस मार्ग पर यातायात सात गुना तक बढ़ गया है। इस सड़क को फोर लेन करने का प्रस्ताव वर्षों से लंबित है।
इसी तरह, लखनऊ-अयोध्या नेशनल हाईवे को छह लेन में तब्दील करने का प्रस्ताव आया था, लेकिन राम मंदिर निर्माण के दौरान यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई। अब मामला उसी पुरानी सड़क को सुधारने तक ही सीमित रह गया है। यह हाईवे कई कस्बों और घनी आबादी से होकर गुजरता है, जहां आए दिन हादसे होते रहते हैं।
बाराबंकी- हैदरगढ़ मार्ग की हालत भी बदतर है। इस सड़क पर न तो फुटपाथ है और न ही साइकिल ट्रैक। हरख से बाराबंकी तक आए दिन लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। देवा-फतेहपुर, कुर्सी-लखनऊ, रामसनेहीघाट-हैदरगढ़ मार्ग जैसी कई प्रमुख सड़कों के चौड़ीकरण प्रस्ताव अभी तक केवल कागजों में ही हैं। एसपी अर्पित विजयवर्गीय और एआरटीओ प्रशासन अंकिता शुक्ला का कहना है कि लगातार अभियान चलाया जा रहा है। सड़क सुरक्षा को लेकर भी सर्वे किया जा रहा है।
ओवर स्पीड सबसे बड़ा कारण
जिला पुलिस और परिवहन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क हादसों की सबसे बड़ी वजह ओवरस्पीड है। सड़कें पहले से अधिक वाहनों का भार झेल रही हैं, लेकिन नियंत्रण के लिए कोई आधुनिक तकनीक नहीं लगाई गई। न तो हाईवे पर ऑनलाइन चालान प्रणाली है, न ही कहीं स्पीड कंट्रोल सेंसर या कैमरे लगाए गए हैं।
दुर्घटना के बाद गोल्डन ऑवर में इलाज नहीं
दुर्घटना के बाद पहला एक घंटा गोल्डन ऑवर होता है, लेकिन हाईवे पर ट्रॉमा सेंटर या फर्स्ट एड यूनिट तक नहीं हैं। गंभीर घायलों को लखनऊ के केजीएमयू भेजा जाता है, जहां तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर घायल दम तोड़ देते हैं।
बीते तीन साल हादसों का हाल
वर्ष हादसों की संख्या-मौतेंघायल
2023864 460-549
2024943-527494
2025753-391412 अबतक