पैसा और बिरादरी के ध्रुवीकरण से घटा जीत-हार का अंतर
-पिछले चुनाव में अध्यक्ष पद पर फतेहपुर, टिकैतनगर व सिद्धौर में हुई थी कांटे की टक्कर
अमर उजाला ब्यूरो
बाराबंकी। चुनावी वैतरणी पार करने के लिए दलीय और निर्दलीय उम्मीदवार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। नगर निकाय व पंचायत चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो जीत का अंतर सैकड़ा और दहाई तक सिमट कर रह गया है। कई बार तो हार जीत का अंतर इतना कम होता है कि दोबारा मतगणना में दूसरा प्रत्याशी बाजी मार ले जाता है। इसके पीछे धन बल और जातिगत मतदान काफी हद तक प्रमुख कारण माना जाता है। जिले में पिछले 2012 के नगर निकाय चुनाव में तीन नगर पंचायतों के अध्यक्ष पदों पर दो सौ वोटों से जीत हार का अंतर रह गया था। वहीं प्रधानी चुनाव में कुछ ग्राम पंचायतों में दोबारा मतगणना के बाद प्रत्याशी चुनाव जीते थे।
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केस नं.-01
दस मतों जीती थी सभासदी
पिछले 2012 के चुनाव में नगर पालिका परिषद के सरावगी वार्ड में बेहद कम मार्जिन से जीत हार का अंतर देखने को मिला था। इस वार्ड में भाजपा के सभासद प्रत्याशी मनोज गुप्ता गोविंदा ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बृजेश यादव से मात्र दस वोटों से ही जीत हासिल कर पाए थे। नगर पालिका ही अन्य निकायों के सापेक्ष इस वार्ड में सबसे कड़ी टक्कर देखने को मिली थी।
केस नं.-02
जीत की परंपरा टूटने से बची थी
फतेहपुर नगर पंचायत के अध्यक्ष पद पर भी कस्बे में पहली बार इस सीट पर इतनी कड़ी टक्कर देखने को मिली थी। आजादी के बाद से आज तक एक ही परिवार में काबिज नगर पंचायत अध्यक्ष की इस सीट पर रेशमा मशकूर व मास्टर इरशाद अहमद कमर के बीच कांटे की टक्कर हुई थी। जिसमें रेशमा मशकूर ने मात्र 254 वोटों से चुनाव जीत कर परपंरा को कायम रखा था। यह चुनाव में उस समय चर्चा का विषय बना रहा था।
केस नं.-03
सिद्धौर में भी रहा रोचक चुनाव
इसी प्रकार तीसरा चुनाव सिद्धौर नगर पंचायत में देखने को मिला था। जिसमें कमरुलनिशां बादशाह ने अपने विपक्षी उम्मीदवार रामदेव को कड़ी टक्कर देते हुए करीब 1250 वोटों से जीत हासिल की थी। हार जीत का अंतर भले ही इतना कम न हो लेकिन चुनाव जोरदार तरीके से देखने को मिला था।
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वोटरों में रहती है असमंजस की स्थिति
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शहर के मोहल्ला रसूलपुर निवासी दीपक कुमार कहते हैं की वोटर आखिर तक इस असमंजस में रहता है कि वह किसे वोट करें। आलम यह हो जाता है कि व्यवहार के चलते घर के सदस्य किसी को नाराज नहीं करना चाहते। वह वार्ड के परिचित दो-तीन प्रत्याशियों को वोट कर देते हैं।
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नगर पालिका परिषद के ही सत्यप्रेमी नगर निवासी मनोज द्विवेदी कहते हैं कि स्थानीय चुनाव में धर्म और जातिगत राजनीति का कोई मतलब नहीं होता है। वार्ड के विकास के लिए अपने परिचित व ईमानदार अध्यक्ष व सभासद को जीताने के लिए वोट करते हैं। आखिर तक यह स्थिति रहती है कि किस प्रत्याशी को वोट किया जाए। कई परिचित चुनाव मैदान में आ जाने से दोनों को वोट देने के लिए परिवार के सदस्य बंट जाते हैं।
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क्या कहते पार्टियों के जिलाध्यक्ष
कांग्रेस के जिलाध्यक्ष अमरनाथ मिश्र कहते हैं कि कम मार्जिन वाले चुुनावों में धन बल का प्रयोग होता है। तभी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है। सपा जिलाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह कहते हैं कि लोकल चुनाव में मतदाताओं पर यह निर्भर करता है कि वह अपने मोहल्ले के विकास के लिए किसे पंसद करता है। और वह उसी को वोट देकर जीताता है। भाजपा अध्यक्ष अवधेश श्रीवास्तव व बसपा अध्यक्ष केके रावत भी यही कहते हैं कि मतदान के रुझान का कोई कारण नहीं होता है। मतदाता अपने पसंदीदा व काम कराने वाले प्रत्याशी को ही चुनता है।