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घाघरा का जलस्तर घटा, कटान हुई तेज

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घाघरा का जलस्तर घटा, कटान तेज
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- जलभराव से आवागमन के रास्ते बंद
- गोंडा जिले के गांवों से पानी लाकर प्यास बुझा रहे बाढ़ पीड़ित
- मवेशियों के चारे का संकट
अमर उजाला ब्यूरो
37,38
बाराबंकी। घाघरा का जलस्तर खतरे के निशान से नीचे पहुंच गया। तराई बेल्ट में नदी का कटान तेज हो गया है। खेतों के घाघरा में समाने का दर्द किसानों को सताने लगा है। वही घाघरा के उस पार बसे सिरौलीगौसपुर व रामसनेहीघाट तहसील के रायपुर मांझा, परसावल, नाउनपुरवा, चरपुरवा, नैपुरा, बेहटा व कमियार तथा रामनगर तहसील के जमका व खुज्जी गांवों के पानी भरा है तो आवागमन के रास्ते भी जलभराव के चलते डूबे हुए है। ऐसे में बाढ़ कार्य में लगे अधिकारी व कर्मचारियों को भी ट्रैक्टर के सहारे गांव तक पहुंच पा रहे है। करीब पखवारे से बाढ़ की समस्या से परेशान तराई के बाशिंदों की परेशानियां दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।
रकिववार को एल्गिन ब्रिज पर केंद्रीय जल आयोग के कर्मचारियों द्वारा घाघरा का जलस्तर 105.766 मापा गया। जो खतरे के निशान से 32 सेंटीमीटर नीचे थे। घाघरा का जलस्तर घटने से रामनगर तहसील के तपेसिपाह व कोरिन पुरवा, कंचनापुर तथा सिरौलीगौसपुर तहसील के कोठरी गौरिया के पास कटान तेजी से हो रही है। वहीं, नैपुरा गांव के बगल बंधें के पास भी कई जगह पर कटान हुई। गांव व खेत पानी में डूबे होने के कारण ग्रामीणों को काफी दिक्कतें हो रही है। मवेशियों के चारे का संकट बना हुआ है। ग्रामीण सियाराम, गोपी व रामू ने बताया कि पीने के पानी को लेकर काफी परेशान है। ऐसे में गोंडा जिले से ट्रैक्टर-ट्राली से पानी लाकर प्यास बुझाई जा रही है।
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सरकारी नावों की हो रही मरम्मत
एल्गिन व्रिज पर रविवार से केंद्रीय जल आयोग की जर्जर लोहे की नांव को दुरुस्त करने के लिए गोरखपुर से आए कारीगर दुरुस्त कर रहे थे। एल्गिन ब्रिज पर तो सरकारी नाव का जखीरा लगा है। मगर, पड़े-पड़े यह नाव में जंग लग गया। जिसके कारण वह निष्प्रोज्य हो गई। मगर, केंद्रीय जल आयोग ने अपनी नाव की मरम्मत करा रहा है। वहीं ग्राम प्रधानों ने भी डीपीआरओ की सख्ती के बाद नाव बनवाने का आर्डर दिया है। उनकी नाव गनेशपुर लकड़ी मंडी में तैयार की जा रही है।
बाढ़
गौने की रात व बेटे की जन्म का दर्द छलका
- बाढ़ पीड़ितों ने सुनाई आपबीती, कहा रोटी के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ता
कवेंद्र नाथ पांडेय
अमर उजाला ब्यूरो
बाराबंकी। प्रतिवर्ष घाघरा नदी की बाढ़ में अपना सब कुछ गंवाने वाले पीड़ितों की जिंदगी पर नजर डाले तो आदिवासियों की तरह बदतर जीवन जीने को विवश है। वर्ष में चार महीने रोटी का जुगाड़ करने के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। बाकी समय घरौंदा बसाने और दो जून की रोटी के इंतजाम में ही कट जाता है। बुजुर्गों से बाढ़ के बारे में जानकारी ली तो उनका दर्द ऐसे छलका जिसे सुनकर सबकी आंखें भर आएंगी। एक महिला ने तो अपनी आप बीती सुनाते हुए कहा कि गौने के बाद ससुराल जिस दिन पहुंची थी उसी दिन बाढ़ का पानी आने से गांव छोड़कर सड़क पर जाना पड़ा। यही नहीं कइयों ने तो बाढ़ में नाती-पोतों की परवरिश व बेटे की जन्म तक का अनुभव बयां किया।
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फोटो-33
किस्मत घाघरा की कछार में ले आई
गौने की रात से लेकर नाती-पोतों को बाढ़ में कलेजे से लगाकर बचाने वाली रामनगर तहसील के तपेसिपाह गांव की रामा सन 1983 से बाढ़ का मंजर देख रही है। घाघरा को देखकर ही डर लगता था। मगर, उनकी किस्मत ने उन्हें घाघरा की कछार में ले आई। जीवन के अंतिम पड़ाव में जीवन बीता रही रामा ने बताया कि उन्होंने बताया कि गौने की पहली रात में ही बाढ़ से पूरा गांव बह गया था। मायके से मिला सर-सामान भी ठीक से नही देखा था। वह भी घाघरा में बह गया। उनकी पति ने उन्हें कंधे पर बैठाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। उसके बाद से तो मानों तो रिश्ता ही बाढ़ से हो गया था। हर वर्ष बाढ़ आने पर गांव छोड़ना फिर आकर बसने में बेटा-बेटी और अब नाती पोता हो गए। रामा कहती है कि जब पहली बार बाढ़ का मंजर देखा तो हेलीकाप्टर से राहत सामग्री के पैकेट बांटे गए थे। लोगों को राहत सामग्री से ज्यादा हेलीकाप्टर देखने की ललक थी।
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बाढ़ ने तराई के लोगों को उबरने नहीं दिया
बाढ़ ने तराई के लोगों को उबरने नहीं दिया। साल भर की कमाई बस 5 महीने की बाढ़ में सब कुछ बर्बाद कर देती है। यह कहते ही तपेसिपाह गांव के श्रीकिशन की आंखें भर आई। उन्होंने बताया 1983 की बाढ़ के समय ही एक बेटा हुआ था। मगर, बाढ़ के आगे बेटे कें जन्म की खुशियां फीकी रही। उन्होंने कहा कि 1983 की वह बाढ़ देखी जिसमें पूूरा का पूरा गांव बाढ़ में बह गया था। घाघरा ने कटान का अपना स्थान बदल लिया। जिसके बाद गांव के भी दो भाग हो गए। बाढ़ खत्म हुई तो गांव के आधे लोग उस पार बसे गए तो आधे इसी पार अपना आशियाना बनाकर रह रहे है। उन्होंने कहा कि बाढ़ के कई दिन बीना खाए पिए बीता दिए। राहत सामग्री किसी दे भी दी तो भूखे बच्चों की ओर लेकर भगता था। उन्होंने कहा कि घाघरा की बाढ़ कछार मे बसने वाले गांवों के लिए अभिशाप बनी हुई है।
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