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मुरझाए चेहरे और सूखे होंठ लिए पैदल आए युवा मजदूर

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मिनी ट्रक में सवार होते महानगरों से आए मजदूर। - फोटो : BANDA
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बांदा। मुरझाए चेहरे, सूखे होंठ। सिर के बालों पर धूल की मोटी परत। कपड़े मैले-कुचैले। पीठ पर सामान का बैग। कुछ ऐसी ही हुलिया वाले 10 युवक सोमवार की दोपहर यहां पश्चिम सीमा से शहर में दाखिल हुए। स्वतंत्रता स्मारक अशोक लाट पर कुछ देर थकान मिटाने के लिए पड़ाव डाले इन मजदूरों ने जो आपबीती बताई वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम कर देने के लिए काफी हैं।
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बबेरू क्षेत्र के एक गांव निवासी 10 युवक (सभी अविवाहित) कई वर्षों से 11 हजार रुपये पगार पर भिवाड़ी (हरियाणा) की ग्लूकोज फैक्ट्री में काम करते थे। वहां दो हजार रुपये किराए पर मकान लिए थे। होली मनाने आए थे।
17 मार्च को फिर वापस पहुंच गए। ये बताते हैं कि 25 मार्च की शाम फैक्ट्री मालिक ने तालाबंदी घोषित कर उन्हें दो-दो हजार रुपये थमाकर अपने घरों को वापस जाने का फरमान सुना दिया। कोई वाहन न मिलने से इन युवा मजदूरों का जत्था अगले ही दिन पैदल चल पड़ा। 45 किलोमीटर का सफर तय करके पलवल (हरियाणा) आया। यहां से बस से आगरा जाते समय 20 किलोमीटर पहले ही पुलिस ने उतार लिया।
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आगरा तक पैदल आए इन मजदूरों को दूसरी बस ने झांसी पहुंचा दिया। 29 की रात 8 बजे ये झांसी पहुंचे। वहां से एक ट्रक में मऊरानीपुर तक आए। सोमवार को तड़के मऊरानीपुर से बांदा ट्रक पर आते समय पुलिस ने बांदा से 18 किलोमीटर पूर्व मटौंध के पास उतार दिया। वहां से सब कड़ी धूप में पैदल चलकर बांदा मुख्यालय पहुंच गए। मजदूर बताते हैं कि किसी बस या ट्रक वाले ने उन पर कोई रियायत नहीं बरती। सभी ने किराया लिया।
18 से 25 वर्ष उम्र के इन मजदूरों ने यह बताया कि टुकड़े-टुकड़े की इस यात्रा में बांदा तक उनके 1800 रुपये खर्च हो गए। मात्र 200 रुपये ही बचे हैं। वह भी तब जब पैसे से कुछ खाना-पानी नहीं खरीदा। युवाओं ने बताया कि झांसी तक कई स्थानों पर उन्हें पुलिस और स्वयंसेवियों ने लंच पैकेट और पानी इत्यादि दिया, लेकिन झांसी के बाद बांदा तक किसी ने नहीं पूछा। मजदूरों ने बताया कि फैक्ट्री मालिक ने यह भरोसा दिलाया है कि जून तक शायद फैक्ट्री चालू हो। यह भी कहा है कि उनकी बकाया पगार उनके खातों में भेजेगा।
बीए करने के पांच वर्ष बाद भी जॉब नहीं मिला तो भिवाड़ी (हरियाणा) में ग्लूकोज की फैक्ट्री में काम तलाश लिया। घरवालों ने दो माह बाद 27 जून को शादी तय कर दी। मात्र 11 हजार रुपये मासिक पर नौकरी करता रहा रंजीत फैक्ट्री बंद हो जाने से तीन दिन की अति कष्टदाई यात्रा के बाद सोमवार को अपने गांव (बबेरू क्षेत्र) लौट आया। शादी तो दरकिनार फिलहाल घर खर्च के लाले हैं। शादी अब तभी कर पाएगा जब फैक्ट्री चलेगी और उसे जॉब मिल जाएगी।
बबेरू क्षेत्र के ही एक गांव के युवक की शादी 2 मई को तय हो चुकी है। घर में तीन भाइयों के बीच मात्र चार बीघा जमीन के भरोसे शादी का खर्च मुमकिन नहीं। घर और शादी का खर्च जुटाने के लिए लवलेश हरियाणा की एक फैक्ट्री में काम कर रहा था। 25 मार्च को फैक्ट्री में तालाबंदी के बाद वह अपने अन्य साथियों के साथ तीन दिन का कष्टदाई सफर तय करके गांव लौट आया है। फैक्ट्री मालिक ने पगार भी नहीं दी। अब शादी कैसे होगी?
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