बांदा। महोबा के गौरहारी गांव में ब्लास्टिंग के धमाके से थरथरा उठे पहाड़ और भारी भरकम चट्टानों के ढह जाने से पांच युवा मजदूरों की मौत की यह पहली घटना नहीं है। पहले भी चट्टानों के टुकड़े मजदूरों या पहाड़ाें के इर्द-गिर्द रहने वालों की जान ले चुके हैं। ठेकेदार, खनिज विभाग, प्रशासन और पुलिस की जुगलबंदी हर बार भूखे-टूटे मजदूरों को चंद पैसे थमाकर मामला रफा दफा करवा देती है। यही कारण है मजदूरों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। खनन के काम में ‘माननीय’ भी खुलेआम शामिल हैं। उनके नाम पहाड़ों और बालू के पट्टे हैं।
गौरहारी से मिलती-जुलती घटनाएं पहले भी कई बार हुई हैं, जिसमें मजदूरों की जानें गई हैं। वर्ष 2009 में गौरहारी पहाड़ में ही खनन करते समय ब्लास्टिंग से चार मजदूरों की मौत हो गई थी, लेकिन यह मामला रफादफा कर दिया गया। वर्ष 2010 में जवाहर नगर (कबरई) के पचपहरा पहाड़ में ब्लास्टिंग से करीब एक किलोमीटर दूर अपने घर के आंगन में खेल रहे आठ वर्षीय मासूम उत्तम प्रजापति की मौत हो गई थी।
ब्लास्टिंग से हवा में उड़ा पत्थर बच्चे की छाती पर गिरा था। खफा परिजनों ने थाने मेें शव रखकर जाम लगाया था। इस मामले की एफआईआर तक नहीं हुई और ले देकर मामला रफादफा करा दिया गया। वर्ष 2012 में डहर्रा (कबरई) पहाड़ में मजदूर ब्लास्टिंग के लिए चट्टानों में विस्फोटक भर रहे थे। इसी दौरान आकाशीय बिजली चमक उठी और विस्फोट हो गया। इसमें दो लोग मारे गए और कई घायल हो गए थे। वर्ष 2014 में डहर्रा में ही पहाड़ में खनन में लगे मजदूर की आकाशीय बिजली से हुए विस्फोट से मौत हो गई।
अवैध खनन का विरोध और मजदूरों की वकालत करने वाले इस क्षेत्र के समाजसेवी पंकज सिंह परिहार और आशीष सागर बताते हैं कि पहाड़ के ठेकेदारों, खनिज विभाग, पुलिस और प्रशासन की जबरदस्त जुगलबंदी के चलते ऐसे मामले अदालत तक नहीं पहुंच पाते। आमतौर पर मरने वालों के परिजनों को एक लाख और घायलों को 50 हजार तथा इलाज खर्च देकर खामोश कर दिया जाता है। पहाड़ों में रात-दिन होने वाले धमाकों से आसपास की बस्तियां खतरे में हैं। विस्फोट से दूर-दूर तक हवा में उड़े चट्टानों के टुकड़े घरों पर गिरते हैं। आसपास के खेत, खपरैल और घरों के आंगन आदि चट्टानों के इन टुकड़ों से पटे रहते हैं।
पहाड़ सफाचट, नीचे खुदाई से बन गई झील
बांदा। पहाड़ों को तेजी से सफाचट कर रहे पट्टाधारक और ठेकेदार अपने रसूख और चांदी के जूते के बलबूते खनन के लिए निर्धारित मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। खनिज विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी आंखें मूंदे हैं। अवैध खनन का लंबे अर्से से विरोध कर रहे आशीष सागर बताते हैं कि पहाड़ों को सफाचट करने के बाद पट्टाधारक पहाड़ के कई-कई सौ फिट नीचे तक खनन कर चुके हैं। यहां तक की इनमें पानी निकल आया है। गहरे कुएं और झील बन गए हैं। इसके बाद भी भारीभरकम मशीनोें से खुदाई का सिलसिला जारी है।
पहाड़ ब्लास्टिंग और खनन के मानक
-खदानों में ब्लास्टिंग का समय दोपहर दो से रात 12 बजे तक निर्धारित है, लेकिन 24 घंटे ब्लास्टिंग कराई जा रही है।
-किसी भी ऐतिहासिक या पुरातत्व महत्व के स्थल से 100 मीटर के दायरे में खनन वर्जित है। 200 मीटर तक खनन और निर्माण के लिए पुरातत्व विभाग से एनओसी लेना अनिवार्य है।
-पत्थर, गिट्टी तोड़ने या ब्लास्टिंग करते समय मजदूरों को मास्क, हेलमेट आदि लगवाना अनिवार्य है।
-पहाड़ों को तोड़ने के लिए विस्फोट में अमोनियम नाइट्रेट और जिलेट छड़ का इस्तेमाल होता है। चट्टानों में ड्रिल मशीन से सुराख कर इन्हें भर दिया जाता है। इस काम को अंजाम देने वाले मजदूर अनपढ़ और अशिक्षित होते हैं।