बांदा। पुलिस विभाग में पद, प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी के अनुरूप सुविधाएं तय करने की पुरानी परंपरा के विपरीत वर्दी भत्ते के मामले में एक चौंकाने वाली असमानता सामने आई है। यह विसंगति दर्शाती है कि कानून-व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले उच्चाधिकारियों की तुलना में निचले स्तर के कर्मियों को वर्दी के लिए अधिक राशि मिल रही है। विशेष रूप से पीपीएस संवर्ग इस मामले में सबसे अधिक उपेक्षित नजर आता है।
आंकड़ों से पता चलता है कि जहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को प्रतिवर्ष 2000 रुपये वर्दी भत्ता दिया जाता है। वहीं आरक्षी और मुख्य आरक्षी को सालाना 3000 रुपये मिलते हैं। यह राशि इन कर्मियों के लिए सम्मानजनक मानी जाती है। हालांकि, जैसे-जैसे पदक्रम में ऊपर बढ़ते हैं, यह राशि कम हो जाती है। उपनिरीक्षक और निरीक्षक जैसे अधिकारियों को पांच वर्षों में कुल 7500 रुपये वर्दी भत्ता मिलता है। जिसका अर्थ है कि उन्हें प्रति वर्ष औसतन केवल 1500 रुपये ही प्राप्त होते हैं।
यह राशि उनके द्वारा निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं मानी जा सकती। सबसे चिंताजनक स्थिति पीपीएस संवर्ग की है। इन अधिकारियों को सात वर्षों में कुल 6400 रुपये वर्दी भत्ता दिया जाता है, जो प्रति वर्ष औसतन मात्र 914 रुपये बैठता है। यह राशि पुलिस ढांचे में मिलने वाले वर्दी भत्तों में सबसे कम है। इस तुलना में, आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारियों को प्रतिवर्ष 25 हजार रुपये वर्दी भत्ता मिलता है, जो पीपीएस अधिकारियों की तुलना में आठ से बारह गुना अधिक है।
इस मामले पर अपर पुलिस अधीक्षक शिवराज का कहना है कि वर्दी भत्ता शासन स्तर पर तय नियमों के अनुसार दिया जाता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रैंक और जिम्मेदारी के अनुरूप इसमें संतुलन होना चाहिए। उनका मानना है कि मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार की तत्काल आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी स्तरों पर कर्मियों को उनकी भूमिका के अनुसार उचित सुविधाएं मिलें।