बांदा। ‘वो कहते हैं ये मेरा तीर है जां लेके निकलेगा, मैं कहता हूं ये मेरी जान है मुश्किल से निकलेगी।’ यह शेर लिखने वाले मशहूर शायर और गजलकार पंडित आनंद मोहन जुत्शी उर्फ गुलजार देहेलवी के निधन पर यहां शायरों, साहित्यकारों और समाजसेवियों ने गहरा अफसोस जताया है।
93 बरस की उम्र में शुक्रवार को दिल्ली में उनका निधन हो गया था। वह 7 जुलाई 1926 को पुरानी दिल्ली में पैदा हुए थे। देश की आजादी के आंदोलन के कई जलसों में उन्होंने अपनी शायरी से आजादी के दीवानों में जोश भरा। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनकी शायरी के मुरीद थे। उनके पिता त्रिभुवननाथ उर्फ जार देहेलवी भी मशहूर शायर थे। गुलजार देहेलवी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कई अवार्ड से नवाजा गया।
शायर और सपा जिला पूर्व अध्यक्ष शमीम बांदवी ने कहा कि गुलजार साहब का ये शेर- इल्मो फन अदब का जना छोड़ जाऊंगा, उर्दू की खुशबुओं का जहां छोड़ जाऊंगा। सदियां करेंगी याद जिसे नस्ल बादे नस्ल, शेरो सुखन के ऐसे निशां छोड़ जाऊंगा। हमेशा याद रहेगा।
पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हाजी शकील अली और सपा अल्पसंख्यक मोर्चा पूर्व जिलाध्यक्ष मुशीर अहमद फारुखी ने कहा कि गुलजार देहेलवी भारत की शान और हिंदू-मुस्लिम एकता का नमूना थे। शायर नजर बांदवी, डा.खालिद इजहार बांदवी, नजरे आलम बांदवी आदि ने भी उनके निधन पर अफसोस जताते हुए खिराजे अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की।